महंगी शिक्षा घटते रोजगार बंद होते कालेज
Sarita|September Second 2020
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महंगी शिक्षा घटते रोजगार बंद होते कालेज
कोरोना के कारण मातापिता पर चौतरफा मार पड़ रही है. जहां एक तरफ नौकरी का खतरा सिर पर मंडरा रहा है, वहीं इन विषम परिस्थितियों में आसमान छूती स्कूलकालेज की फीस ने उन की कमर तोड़ दी है. आखिर करें तो करें क्या?
शैलेंद्र

लखनऊ के रहने वाले मुकेश कुमार मिश्रा सहारा मौल में मैनेजमैंट सैक्शन में काम करते थे. 25 हजार रुपए महीना वेतन मिलता था. मुकेश के पास गांव में जमीन थी तो खेती से कुछ आमदनी हो जाती थी. वेतन और खेती की आमदनी पर 4 लोगों का परिवार, मुकेश के साथ पत्नी नेहा और 2 बेटे शुभम व विनय गुजारा कर लेते थे. 2014 में मुकेश के बड़े बेटे शुभम ने 12वीं कक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए नोएडा स्थित मोदी कालेज में पढ़ाई के लिए एडमिशन ले लिया. वहां हर साल 3 लाख 50 हजार रुपए फीस, होस्टल का खर्च और दूसरे खर्च मिला कर लग जाते थे. मुकेश को सालभर के वेतन से 3 लाख रुपए मिल जाते थे. कुछ बचत उन्होंने कर रखी थी. सब मिलाजुला कर घर का काम चल रहा था. मुकेश को लग रहा था कि 4 वर्षों बाद शुभम कमाने लगेगा. तब वे दूसरे बेटे विनय की पढ़ाई का खर्च भी उठा लेंगे.

पढ़ाई पूरी होते ही कैंपस सलैक्शन में 30 हजार रुपए महीने वेतन पर शुभम दिल्ली स्थित एक प्राइवेट फर्म में सौफ्टवेयर इंजीनियर बन गया.

मुकेश का दूसरा बेटा विनय भी 12वीं के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लगा. वह बरेली के एसएमआरएस कालेज में था. वहां भी करीब 3 लाख 50 हजार रुपए फीस, होस्टल का खर्च और दूसरे खर्च मिला कर लग जाते थे. मुकेश की चिंता अब कम हो गई थी क्योंकि शुभम की जौब लग गई थी. छोटे बेटे विनय का पहला साल पूरा होता, इस के पहले ही देश पर कोविड-19 का हमला हो गया. मुकेश का सारा बजट और प्लानिंग फेल हो गई. मुकेश के वेतन में 30 फीसदी कटौती हो गई और बेटे शुभम को उस के औफिस से छुट्टी पर भेज दिया गया.

मुकेश कहते हैं, अब विनय की पढ़ाई भारी पड़ रही है. दूसरे साल की आधी फीस तो किसी तरह से जमा कर दी है पर आगे की फीस के लिए कोई रास्ता नहीं दिख रहा है. अगर हम लोगों की नौकरी नहीं लगी तो घर का खर्चा चलना मुश्किल हो जाएगा, जमीनजायदाद बेचनी पड़ जाएगी.

मुकेश के बेटे को तो नौकरी मिल भी गई थी पर दिनेश त्रिपाठी के लिए दिक्कत यह है कि बेटी रिया को एमबीए में प्रवेश दिलाया. उस के 2 साल पूरे हो गए. 2 साल पढ़ाई के बाकी हैं. उस में कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च हो गया था. इस बीच कोविड, लौकडाउन का दौर आ गया. दिनेश की अपनी जौब में वेतन से 40 फीसदी की कटौती होने लगी थी, जिस से अब उन के लिए घर चलाना व बेटी को पढ़ाना मुश्किल हो गया. दिनेश कहते हैं, हमारे वेतन से तो घर का ही खर्च चलना मुश्किल है. ऐसे मे एजुकेशन के लिए बैंकलोन के लिए अप्लाई किया है."

दिनेश और मुकेश जैसे कई दूसरे पैरेंटस भी हैं. मध्यवर्ग के ऐसे पेरैंट्स के लिए कालेज ही नहीं, स्कूल में बच्चों की पढ़ाई भी भारी पड़ रही है.

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September Second 2020