संविधान भक्त कोर्ट के कठघरे में
Sarita|September First 2020
संविधान भक्त कोर्ट के कठघरे में
सुप्रीम कोर्ट में चला यह दिलचस्प मुकदमा है जिस में प्रशांत भूषण को 1 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई या फिर 3 महीने की कैद भुगतने को कहा गया. इस मुकदमे ने कई मिथक तोड़े हैं तो कई गढ़े भी हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की लाचारी और भी ज्यादा हैरान कर देने वाली है जो अपने ही बिछाए जाल में फंसा नजर आ रहा है. पेश है अदालतों की बदहाली की पड़ताल करती खास रिपोर्ट.
भारत भूषण श्रीवास्तव

'प्रशांत भूषण के कंटेंप्ट औफ कोर्ट से पहले आप मेरे कंटेंप्ट औफ क्लाइंट मुद्दे पर मेरी पीड़ा सुनिए, क्योंकि मैं एक सभ्य शहरी हूं और 10 वर्षों से तलाक के लिए अदालतों की चौखट पर एड़ियां रगड़ते न्याय पाने के लिए तरस रहा हूं. मैं पूरे होशोहवास में बिना किसी दबाव या प्रलोभन के कह रहा हूं कि अदालत मुझे न्याय नहीं दे पा रही है. मेरी जवानी और कैरियर दोनों बरबाद हो गए हैं. मैं पूछ रहा हूं, क्या हमारी अदालतें और न्याय व्यवस्था इतनी अपाहिज, लाचार और कमजोर हैं कि सालोंसाल तक तलाक के एक मुकदमे का फैसला न कर पाएं, क्या यह अवमानना के दायरे में नहीं आना चाहिए?

यह कहना है भोपाल के जानेमाने पत्रकार योगेश तिवारी का जो अब 44 साल के हो चुके हैं. उन का अपनी पत्नी से 16 नवंबर, 2010 को तलाक हो गया था. उन की शादी 13 जून, 2006 को हुई थी. जल्द ही पतिपत्नी दोनों में मतभेद उभरना शुरू हो गए तो वे तलाक के लिए अदालत गए. दोनों पक्षों को सुनने के बाद क्रूरता के आधार पर जिला अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (ए) के तहत विवाहविच्छेद यानी तलाक की डिक्री पारित कर दी.

जिस फैसले को योगेश परेशानी का अंत समझ रहे थे वह, दरअसल, जिंदगी की सब से बड़ी परेशानी का प्रारंभ साबित हुआ. पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील कर स्थगन आदेश ले लिया जो आसानी से उसे मिल भी गया. 10 साल से योगेश लगभग हर महीने भोपाल से जबलपुर जा रहे हैं, लेकिन उन के मुकदमे की सुनवाई नहीं हो रही. कभी जज बदल जाता है तो कभी तारीख लग यानी बढ़ जाती है. योगेश के 86 वर्षीय पिता कैंसर, दिल की बीमारी और डाइबिटीज से ग्रस्त हैं और मां बुजुर्गावस्था के चलते अशक्त हैं. इन दोनों की देखभाल की जिम्मेदारी अकेले योगेश पर है.

जब 22 मार्च को देश में लौकडाउन थोपा गया तो योगेश की न्याय की बचीखुची आस भी जाती रही, क्योंकि जब कामकाज के आम दिनों में उन का मुकदमा सुनवाई के लिए नंबर पर नहीं आया तो इन खास दिनों में क्या आता जब अदालतें भी लगभग बंद थीं और सिर्फ विशेष मुकदमों की सुनवाई, वह भी वर्चुअल की जा रही थी. लेकिन, योगेश हिम्मत हारने वालों में से नहीं हैं, वे कहते हैं, आप या कोई और मेरे तनाव की कल्पना भी नहीं कर सकते, इस के लिए आप को मुझ सी हालत से गुजरना पड़ेगा और मैं नहीं चाहता कि कोई इस हाल से गुजरे कि हर महीने 8-10 हजार रुपए मुकदमे पर खर्च करे. अपने अशक्त बुजुर्ग मांबाप को भगवान भरोसे छोड़ कर 2 दिनों के लिए भोपाल से जबलपुर जाए और 'दामिनी' फिल्म वाली तारीख पे तारीख की तख्ती लिए मुंह लटकाए वापस आ जाए.

काफी सोचने के बाद योगेश ने बीती 9 मई को जबलपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिख कर दूसरी शादी की इजाजत मांगी. अपने पत्र में उन्होंने अपनी पारिवारिक स्थिति का ब्योरा देते साफ कहा कि प्रकरण के निराकरण की निकट भविष्य में संभावना क्षीण है, इसलिए उन्हें दूसरी शादी की इजाजत दी जाए. बकौल योगेश, उन का एक खतरनाक ऐक्सिडेंट हो चुका है जिस से उन्हें अपने दैनिक कामकाज करने में कठिनाई होने लगी है. अब वे किसी के सहारे की जरूरत शिद्दत से महसूस करने लगे हैं और अपने वृद्ध मातापिता की सेवा के लिए भी उन्हें एक पार्टनर की जरूरत है. लेकिन, दिक्कत यह है कि अपनी पत्नी के स्थगन आदेश के चलते वे दूसरी शादी कानूनन नहीं कर सकते.

उम्मीद के मुताबिक, इस पत्र पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. योगेश ने इस बार मीडिया का सहारा लिया. फर्क इस से भी कुछ नहीं पड़ा, लेकिन एक बात सिद्ध हुई कि अदालतों के बारे में बोलना, आलोचना करना या अपनी राय देना कोई अवमानना नहीं है, अगर है, तो योगेश जैसे पीड़ितों को इस की परवा नहीं जिन के दिल से न्यायालयीन आस्था उठ चुकी है. उन्हें अपनी भड़ास निकालने से अब रोका नहीं जा सकता जो बिना किसी अपराध के सजा भुगत रहे हैं.

अपनी बात विस्तार से कहने के बाद योगेश कहते हैं, प्रशांत भूषण के मामले में एक पत्रकार होने के नाते मेरी भी दिलचस्पी है कि अब 10 सितंबर को क्या होगा, और कुछ होगा भी या नहीं. मुझे यह सोचसोच कर हैरानी हो रही है कि कोविड-19 के कहर के चलते जब न्याय व्यवस्था चरमराई पड़ी है और लंबित मुकदमों की तादाद बढ़ती जा रही है तब प्रशांत भूषण के ट्वीट पर सब से बड़ी अदालत ने क्यों इतनी फुरती दिखाई. कौन सा आसमान गिर पड़ रहा था या धरती फट पड़ रही थी, बात समझ से परे है. इसलिए, मैं कहता हूं कि अब वक्त है कि मुवक्किलों की अवमानना पर भी ध्यान दिया जाए. इतनी चुस्ती अगर अदालतें मुझ जैसे हैरानपरेशान लोगों के सालों से चल रहे मुकदमों में दिखाएं, तो लगेगा कि न्याय उन की प्राथमिकता में कहीं है.

अवमानना के माने

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