शिक्षित बेरोजगार न कमाई न सुकून
Sarita|July Second 2020
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शिक्षित बेरोजगार न कमाई न सुकून
कोरोना वायरस ने न केवल अनपढ़ बल्कि पढ़ेलिखे युवाओं के लिए भी नौकरियों का अकाल ला दिया है. हर तरफ बेरोजगारी पसर गई है जिस के जाने की जल्दी उम्मीद भी नहीं है.
सुमन बाजपेयी

राहुल एक एंड्रॉयड डैवलपर है. वह अमेरिका की एक कंपनी में काम करता है, जिस का हैडऔफिस सेन फ्रांसिस्को में है. साल में 3-4 बार वहां उस का चक्कर लगता ही था, कि वह उन के अच्छे एंप्लाइज में से एक है और 15 लोगों की एक टीम भी भारत से हैड करता है, बेंगलुरु में कंपनी का औफिस है, 4 मार्च को ही वह वहां से भारत लौटा था. 1 अप्रैल को कंपनी के सीईओ की मेल आई कि उस की टीम के सारे लोगों, जो अमेरिका में हैं, को निकाल दिया गया है, वजह कोरीना के इस संकटग्रस्त समय में मंदी ही थी. राहुल परेशान है, क्योंकि उसे नहीं पता कि उसे भी कब नौकरी से हाथ धोना पड़े.

कोरोना वायरस के कारण लागू किए गए लौकडाउन का असर हर क्षेत्र में पड़ा है. इस की वजह से बेरोजगारी की समस्या और उस से जुड़ी आर्थिक मंदी ने युवाओं के जीवन को अस्तव्यस्त कर दिया है, उन के पास डिग्गियां हैं, योग्यता है, पर नौकरी नहीं है, प्राइवेट संस्थार्नी से महंगी शिक्षा प्राप्त करने के पीछे युवाओं का उद्देश्य केवल मोटे वेतन वाली नौकरियां पाना होता है, जिस के लिए वे कर्ज लेते हैं, लेकिन लौकडाउन से सारी स्थिति ही उलट गई, वे घर बैठे हैं और कर्ज चुकाना तो दूर, उस पर लगने वाला ब्याज देना भी उन्हें भारी हो गया है.

बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़े

वायरस के लगातार बढ़ते मामले किस ऊंचाई पर पहुंच कर कम होंगे, इस का अभी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन लौकडाउन ने नौकरियों का कितना नुकसान किया है, यह स्पष्टरूप से दिख रहा है. नौकरियों के नुकसान के आंकड़े बड़े भयावह हैं, रोजगार के मोरचे पर अनिश्चितता झेल रहे लोगों की तादाद आज भारत में रूस की आबादी जितनी हो सकती है.

लौकडाउन से पहले 3.4 करोड़ लोग बेरोजगार थे, लौकाउन के बाद नौकरी गंवाने वाले 12 करोड़ लोगों में इस संख्या की जीड़ दीजिए तो आंकड़ा 15 करोड़ तक पहुंच जाता है, लेकिन उन युवाओं का आंकड़ा अभी स्पष्ट नहीं है, जो पढ़ाई करने के बाद नौकरी पाने की और अग्रसर थे ही कि लौकडाउन हो गया और अर्थव्यवस्था ठप हो गई.

एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई है कि देश में 2.70 करोड़ युवा, जिन की उम्र 20 से 30 साल के बीच है, अप्रैल महीने में बेरोजगार हो गए हैं, बड़े शहरों में लौकडाउन के कारण कई कंपनियों के दफ्तर बंद हो गए या फिर वहां वर्क फ्रॉम होम का नियम अपनाया जा रहा है.

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