घरेलू कामगारों की जिंदगी मुश्किल में
Sarita|July Second 2020
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घरेलू कामगारों की जिंदगी मुश्किल में
सरकार ने जब लौकडाउन किया तो कहा था कि घरेलू कामगारों का वेतन न काटा जाए, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 3 महीने से बिना वेतन के भुखमरी की कगार पर पहुंच चुके ये लोग अभी भी इस उम्मीद में हैं कि लौकडाउन पूरी तरह से खुले और वे वापस अपने काम पर लौट सकें.
नसीम अंसारी

कमला बारबार फोन करती है, पूछती है, “बीबीजी, काम पर कब आ जाऊं?" हर बार उस को टका सा जवाब मिलता है, "अभी मत आ. अभी सोसाइटी में किसी बाहरी को आने की परमिशन नहीं है." पिछले 3 महीने से कमला घर में बंद बैठी है, खाने के लिए बेटे के पैसी की मुहताज हो गई है, लौकडाउन से पहले वह 6 घरों में बरतनझाड़ कर के 8 हजार हजार रुपया महीना कमा रही थी. उस का और उस के बीमार पति का गुजारा इस से चल जाता था. लौकडाउन हुआ तो डेढ़ महीने में सारी बचत खत्म हो गई. अब सुबहशाम की रोटी बेय देता है, वह भी एहसान जता कर.

अब उस की भी तो कमाई खटाई में पड़ी है, किराए का औटी चलाता है. 2 महीने तो बिलकुल काम बंद रहा और अब जो थोड़ाबहुत शुरू हुआ है तो दिनभर में 200 रुपए भी कमाई नहीं है, जिस में से आधा औटो का मालिक ले लेता है. फिर उस के भी 3 बच्चे हैं, बीवी है, उन को भी रोटी खिलानी है.

इसीलिए कमला चाहती है कि इस से पहले कि बेटा भी रोटी देने से मना कर दे, जिन घरों में वह काम करती थी वे घरवाले उस को अब जल्दी ही बुला लें. लेकिन कोरोना के डर से 90 फीसदी लोगों ने अपनी कामवालियों को अभी आने की अनुमति नहीं दी है.

दिल्ली के कीर्तिनगर की एफ लौक कालोनी में रहने वाली मिसेज सेठी कहती हैं, “ पता नहीं कहाँकहां से आती हैं, किसकिस से मिलती हैं, कितनी बीमारियां समेटे घूमती हैं. जब तक कोरीना की मुसीबत टल न जाए, कोई पुख्ता दवाई न आ जाए, तब तक इन कामवालियों से दूरी बनाए रखने में ही भलाई है, इन को बुला कर कौन बीमारी को न्यौता दे.

दिल्ली के ज्यादातर मध्य और उच्चवर्गीय घरों में कामवाली, ड्राइवर, धोजी, माली, कबाड़ीवाला इन सब की एंट्री पर रोक है. यह एक बहुत बड़ा गरीब तबका है जिस की रोजीरोटी कोरोना ने छीन ली है. हाल ही में इंटरनैशनल लेबर और्गेनाइजेशन ने अपनी एक रिपोर्ट जारी की है जिस में कहा गया है कि कोरोना काल में 5.5 करोड़ घरेलू कामगारों की जिंदगी मुश्किल में आ गई है और इन में से अधिकांश महिलाएं हैं. एक अनुमान के आधार पर इस महीने के अंत तक घर में काम करने वाली बेरोजगार महिलाओं की संख्या बढ़ कर 3 करोड़ 70 लाख हो जाएगी.

दिल्ली जैसे बड़े शहरों में अभी 5-7 प्रतिशत महिलाएं ही ऐसी हैं जो काम पर लौट सकी हैं. ज्यादातर महिलाओं को काम पर इसलिए नहीं बुलाया जा रहा है क्योंकि वे मलिन बस्तियों में रहती हैं जहां साफसफाई का वे उस तरह से खयाल नहीं रख सकर्ती जिस तरह से रखना चाहिए, ऐसे हालात में मसला इन की रोजीरोटी का है.

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