सुशांत सिंह राजपूत की मौत का यों उत्सव मनाना संवेदनाओं की मौत होना है
Sarita|July Second 2020
सुशांत सिंह राजपूत की मौत का यों उत्सव मनाना संवेदनाओं की मौत होना है
हकीकत यह है कि देश में स्थिति असामान्य है. लोगों के पास रोजगार नहीं है, है तो उस के जाने का डर बना रहता है. देश भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है. लोग आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. भुखमरी बड़ी समस्या बन कर उभर कर सामने आ चुकी है जिस कारण मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है.
रोहित

सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड की खबरों का सिलसिला अब तक खत्म नहीं हुआ है. कई दिनों से लगातार मीडिया में इस मुद्दे को सनसनीखेज बना कर चलाए जाने से सभी तंग आ चुके हैं. सुशांत क्या खाते थे? क्या पीते थे? उन के क्या सपने थे? कैसे रहते थे? दोस्त कौन थे? भाई क्या करता है? कमरे कितने हैं? चादर कैसी है? पिताजी रो रहे हैं इत्यादि, ये सब बातें मीडिया द्वारा जबरन लोगों को परोसी जा रही हैं.

जाहिर है उन की खुदकुशी ने पूरे देश को हैरान किया है, जिसे किसी के लिए भी यकीन कर पाना आसान नहीं है. ऐसे मौके पर किसी भी मानवीय प्रवृत्ति वाले इंसान का दुखी होना लाजिमी है, और होना भी चाहिए, यही तो इंसान को इंसान से जोड़ता है. लेकिन जब यही मानवीयता लोगों के लिए दिखावा और मीडिया के लिए पैसा कमाने का धंधा बन जाए तो इंसान ठगा हुआ महसूस करता है.

फिल्मी कलाकारों को लोग अकसर पहचान लेते हैं. जब देश में जातिवादी अहंकार के चलते कुछ लोग 'पद्मावत' फिल्म का विरोध कर रहे थे (हालाकि फिल्म देखने के बाद लगा कि इस फिल्म का विरोध करणी सेना द्वारा नहीं बल्कि प्रगतिशील तबके द्वारा होना चाहिए था), खैर, करणी सेना का विरोध इतना बढ़ा कि डायरैक्टर भंसाली को उन के लोगों थप्पड़ तक जड़ दिया था, उस समय सुशांत सिंह राजपूत लोगों की नजरों में आया था.

इसी के चलते सुशांत सिंह ने अपने नाम के आगे लगने वाले जातीय पहचान 'राजपूत' को हटा दिया था. इस फैसले से उन्होंने यह साबित किया कि वे सिर्फ परदे के कलाकार ही नहीं बल्कि समाज के भी कलाकार हैं. जाहिर है उन के इस फैसले ने मुझे प्रभावित किया था और मुझे भी उन का प्रसंशक बना दिया. किंतु उस समय देश के इन्हीं सोशल मीडिया यूजर्स, जो आज दिनरात उन की गाथा गाते थकते नहीं, उन के इस कदम पर उन्हें खूब ट्रोल कर रहे थे.

लेकिन मसला यहां यह नहीं है कि सुशांत कैसे कलाकार थे, मसला यह है कि देश में सुशांत की मौत के अलावा और भी कुछ हो रहा है जो इस खबर को सनसनीखेज बना कर दबाया जा रहा है. जाहिर है देश में कोरोना का कहर अभी भी जारी है. देश में लाखों लोग कोरोना की चपेट में आ चुके हैं जिस में अभी तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि, मीडिया में अब कोरोना से मरने वाले लोगों की मौत महज आंकड़ा बन कर रह गई है. इस पर केंद्र सरकार से सवाल करना मानी पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो गया है.

जिस तालाबंदी को ब्रह्मास्त्र मान कर प्रधानमंत्री 21 दिन के युद्ध की घोषणा कर रहे थे, उस युद्ध की विफलता की चर्चा न तो मीडिया में है, और न ही लोगों के बीच है. कठोर तालाबंदी के कारण आज देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बरबाद ही चुकी है. लोगी की उपभोक्ता क्षमता खत्म हो चुकी है, करोड़ों लोगों की नौकरी जा चुकी है. लोग भूख से बेदम हो चले हैं, कितने लोग मौत के घाट उतर चुके हैं या उसी की प्रतीक्षा में हैं, लेकिन ये खबरें मीडिया में ठहर ही नहीं रही हैं.

तालाबंदी में आत्महत्या

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