संघर्ष,समर्पण... सस्पेंस!
Rajasthan Diary|September 2020
संघर्ष,समर्पण... सस्पेंस!
राजस्थान में एक महीने से ज्यादा लंबी चली सियासी खींचतान का पटाक्षेप हो गया है। सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों के जयपुर लौटने के बाद अशोक गहलोत सरकार विधानसभा में ध्वनिमत से बहुमत साबित करने में सफल रही। हालांकि राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा घटनाक्रम सियासी ड्रामे का इंटरवल मात्र है, देर-सवेर खेमेबाजी फिर से उभरेगी। गौरतलब है कि पार्टी हाईकमान ने सचिन पायलट की मांगों पर गौर करने के लिए अहमद पटेल, के सी वेणुगोपाल राव और अजय माकन की सदस्यता वाली कमेटी का गठन किया है। साथ ही प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे की जगह अजय माकन को जिम्मेदारी सौंपी है। काबिलेगौर है कि जयपुर आने से एक दिन पहले सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी। पायलट गुट का दावा है कि इस मुलाकात में उनकी मांगों और शिकायतों को तफसील से सुना। इस मुलाकात के बाद प्रदेश प्रभारी के पद से अविनाश पांडे की छुट्टी और तीन सदस्यीय कमेटी के गठन को पायलट खेमा अपनी जीत के तौर पर प्रचारित कर रहा है। क्या वाकई में ऐसा है?
अवधेश आकोदिया

सचिन पायलट राजस्थान आ तो गए हैं, लेकिन अब उनके पास न तो उपमुख्यमंत्री का पद है और न ही पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का। फिर जयपुर आने के बाद उन्होंने मीडिया में जितने भी बयान दिए हैं उनमें एक ही लाइन को बार-बार दोहराया है कि 'पद हो या ना हो, प्रदेश की जनता के प्रति अपने दायित्व को निभाता रहूंगा'। उनकी इस बात का यह मतलब निकाला जा रहा है कि शायद राजस्थान में उन्हें पार्टी या सरकार में हाल-फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिलने वाली है। वे अपने समर्थकों को जताना चाहते हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ स्वाभिमान के लिए ही थी और उन्हें कभी किसी पद का कोई लालच नहीं था। संभावना यह भी जताई जा रही है कांग्रेस हाईकमान पायलट को संगठन में प्रदेश के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी सौंप सकता है। हालांकि यह किसी से नहीं छिपा है कि उनका मन केंद्र के बजाय राजस्थान की राजनीति में ही ज्यादा रमता है।

विश्लेषकों के मुताबिक यदि सचिन पायलट तमाम हालातों के मद्देनजर दिल्ली में कोई जिम्मेदारी संभाल लेते हैं तो उनके लिए 2023 के अगले विधानसभा चुनाव तक राजस्थान की सरकार और पार्टी संगठन में कोई प्रत्यक्ष और प्रभावशाली भूमिका निभा पाने की गुंजाइश कम ही नजर आती है। इस हिसाब से राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट का करियर कम से कम तीन वर्ष के लिए पीछे खिसकता दिख रहा है। और यदि 2023 में राजस्थान के मतदाताओं ने चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलने की अपनी परंपरा को बरकरार रखा तो मुख्यमंत्री बनने के लिए पायलट को कम से कम आठ साल का इंतजार करना पड़ेगा। तब तक उनकी उम्र 50 का आंकड़ा पार कर चुकी होगी। और उस वक्त भी उनका वक्त तब आएगा जब सारी राजनीतिक परिस्थितियां उनके पक्ष में होंगी।

कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस दौरान पार्टी हाईकमान सूबे में किसी तीसरे चेहरे को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने पर भी विचार कर सकता है। कई पायलट समर्थकों का भी यह कहना है कि सचिन पायलट की पूरी लड़ाई खुद मुख्यमंत्री बनने की नहीं बल्कि गहलोत को पद से हटाने की थी। इनकी बात के समर्थन में कहा जा सकता है कि तीसरे मुख्यमंत्री का विकल्प पायलट ने 2018 में भी पार्टी शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा था। हालांकि इसे समझना कोई मुश्किल बात नहीं कि पायलट के लिए यह मजबूरी का विकल्प ही रहा होगा। और इस विकल्प को सामने रखकर वे किसी न किसी तरह खुद की दावेदारी ही मजबूत करना चाह रहे होंगे।

वर्तमान घटनाक्रम से पहले तक इस बात का ठीक-ठीक अंदाजा शायद कम ही लोगों को था कि राजस्थान में कांग्रेस के सभी विधायकों में से कितने पायलट के पक्ष में हैं और कितने गहलोत के। लेकिन हालिया घटनाक्रम के दौरान पायलट के साथ पार्टी के 100 में से सिर्फ 18 और 13 निर्दलीय में से महज तीन विधायकों ने ही हरियाणा में डेरा जमाया था। गौरलतब है कि मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ खोले गए मोर्चे में पायलट अपने कई करीबी विधायकों और मंत्रियों तक का समर्थन हासिल नहीं कर पाए। इनमें राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास प्रमुख थे जो इस पूरे विवाद के दौरान अपने बयानों के जरिए पायलट पर बड़े हमले बोलने की वजह से चर्चाओं में रहे थे। जबकि स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा बहुत पहले ही पायलट से दूरी बना चुके हैं।

जानकारों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की सचिन पायलट की मांग पर सिर्फ तभी विचार कर सकता था जब वे पांच सप्ताह हरियाणा में जमे रहने के बजाय शुरुआती दिनों में ही उससे जाकर मिल लेते। सूत्रों के मुताबिक उन दिनों खुद प्रियंका गांधी ने कई बार पायलट से संपर्क साधने की कोशिश की थी। पर नाकाम रहीं, लेकिन जब पायलट को इस बात का अहसास हुआ कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उन्हें और उनके समर्थक विधायकों को अयोग्य घोषित करवाने के बाद बहुमत भी साबित कर देंगे तब जाकर उन्हें गांधी परिवार की याद आई। पायलट के इस डर को भाजपा की कद्दावर नेता व प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अस्पष्ट राजनीतिक रुझानों ने भी हवा देने का काम किया। दरअसल सचिन पायलट आरोप लगाते रहे हैं कि विपक्षी दलों से होने के बावजूद सिंधिया और गहलोत पर्दे के पीछे एकदूसरे की मदद करते रहते हैं।

ऐसे में जानकारों का मानना है कि पायलट अब एक खुली मुट्ठी की तरह हो गए हैं, जिनके लिए कांग्रेस हाईकमान ने अपने दरवाजे भले ही खोल दिए हों लेकिन वह उनकी हर शर्त को मानेगा ही यह कह पाना मुश्किल है। हालांकि राजस्थान में पायलट समर्थकों को शीर्ष नेतृत्व द्वारा गठित की गई कमेटी से बड़ी उम्मीदें है। इन समर्थकों का मानना है कि यह कमेटी ऐसा कोई रास्ता जरूर निकालेगी जिसके सहारे उनके नेता सूबे में सम्मानजनक तरीके से सक्रिय रह सकें। लेकिन विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि कमेटी पायलट गुट को कुछ खास संतुष्ट कर पाने में नाकाम रही तो एक बार फिर कांग्रेस को राजस्थान में अस्थिरता का माहौल देखने को मिल सकता है। गौरतलब है कि मीडिया को दिए अपने बयानों में पायलट ने जिस एक और बात को दोहराया है उसका लब्बोलुआब है कि 'जो बीत गया उसकी चर्चा आवश्यक नहीं और जो भविष्य में होने वाला है उसके बारे में आज निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता है।'

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