ऊंची उड़ान की ख्वाहिश
Outlook Hindi|November 02, 2020
ऊंची उड़ान की ख्वाहिश
चाहे कोई अचरज करे, मगर बिहार को संपन्न राज्य बनाने के दावे के साथ पुष्पम प्रिया चौधरी को विधानसभा चुनाव जीतने का भरोसा
गिरिधर झा

उनकी वाक शैली आकर्षक है। वे प्राचीन मिथिला की प्रसिद्ध महिला दार्शनिक मैत्रेयी, गार्गी और ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर को एक साथ याद करती हैं। वे बिहार के महान इतिहास पुरुषों, मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त, अशोक और महान राजनैतिक रणनीतिकार चाणक्य के साथ-साथ कवि विद्यापति की भी बात करती हैं। लेकिन लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से लोक प्रशासन में डिग्रीधारी वह ट्विटर पर सिर्फ एक ही व्यक्ति को फॉलो करती हैं, सिमोन हिक्स। हिक्स वहीं काम करते हैं और चुनाव और चुनावी प्रणाली के वैश्विक विशेषज्ञ हैं।

मिलिए पुष्पम प्रिया चौधरी से, जिन्होंने बिहार चुनावों के दौरान बिगुल फूंक दिया है। जहां, मतदाताओं की वही शिकायतें हैं, वही पुराने चहरे हैं, चुनाव दर चुनाव घोषणापत्र भी वही हैं, ऐसे में कुछ हटकर एक विकल्प सामने है। एक युवा, जो पहली बार अपने राजनीतिक संगठन के साथ जातिग्रस्त चुनाव पंखों वाले सफेद घोड़े के निशान के साथ चुनाव में उतर रही है। चौधरी को सिर्फ महत्वाकांक्षी कहना कम बयानी होगी। उन्होंने अपने लिए लक्ष्य ऊंचा रखा है। उनकी नजर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है, उससे कम कुछ नहीं। उनकी इच्छा है कि वह अपने गृह राज्य की तकदीर पलट दें। उनके राजनीतिक विरोधी ठिठोली करते हैं! पहले चरण के मतदान के लिए दो ससाह का समय बचा है। यहां तक कि किसी पार्टी ने उनकी उपस्थिति को स्वीकार भी नहीं किया है। मगर वह शांति से चुनौती स्वीकार कर रही हैं।

इसे अति आत्मविश्वास कहें या अनूठा भोलापन, वह पूरी गंभीरता के साथ अपना काम कर रही हैं, हर दिन धूल भरी गलियों की खाक छानती हैं, लोगों को शासन बदलने और बिहार को समृद्ध बनाने की जरूरत के बारे में बताती हैं। ब्रिटिश इंग्लिश, बिहारी हिंदी और मैथिली के मिलेजुले लहजे में जब वह अपनी पार्टी के विकास एजेंडे और विचारधारा के बारे में लोगों को बताती हैं तो लोग उनकी बात पर गौर करते हैं और उन्हें धैर्यपूर्वक सुनते हैं। कुछ लोग उनकी प्रशंसा करते हैं, तो कुछ अजरज से देखते हैं। कुछ जिज्ञासा में उनके पीछे जाते हैं। फेस मास्क सहित वह हमेशा पूरे काले कपड़ों में रहती हैं। इस पर कोई आश्चर्य करे, तो वह उसका मुंहतोड़ जवाब देने में भी जरा नहीं हिचकतीं। मौजूदा नेताओं का विरोध का यह उनका तरीका है। वह पूछती हैं, "वो लोग क्यों हर वक्त सफेद कपड़े पहने रहते हैं? संविधान ने क्या कोई ड्रेस कोड निर्धारित किया है ? " मुस्तैद भीड़ वोटों में तब्दील होगी या नहीं इसकी परवाह किए बिना इतना तो है कि उन्होंने बिहार की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

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November 02, 2020