दलित होने की बेचारगी
Outlook Hindi|November 02, 2020
दलित होने की बेचारगी
हाथरस में दलित बच्ची के साथ बलात्कार की वारदात राज्य सरकार और भाजपा के लिए राजनैतिक चुनौती बनकर उभरी
हरिमोहन मिश्र

सरकार अंग्रेजी राज की तरह “शासन" करने और "काबू" करने के लिए नहीं, लोकतांत्रिक देश में "सेवा" और "रक्षा" करने के लिए है। हाथरस में हुए दलित बच्ची के साथ जघन्य अपराध के सिलसिले में इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ पीठ की यह टिप्पणी जिले तथा राज्य की प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका पर सिर्फ गंभीर सवाल ही खड़े नहीं करती, बल्कि उत्तर प्रदेश की सरकार की कार्यशैली को भी कठघरे में खड़ा करती है। हाइकोर्ट ने हाथरस के जिला मजिस्ट्रेट और कई पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश दिए और कई उच्च अधिकारियों के बयानों पर भी सख्त टिप्पणी की।

हाथरस के चंदपा थाने के तहत बुलगढ़ी गांव के खेतों में घास काटते वक्त 14 सितंबर को गैंगरेप और बेतरह मारपीट की शिकार हुई 19 साल की दलित बच्ची ने 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दम तोड़ दिया तो सारा देश इस हैवानियत से सन्न रह गया था। इन 15 दिनों में स्थानीय पुलिस-प्रशासन का रवैया लीपापोती और अपराधियों को बचाने का था ही, लेकिन लड़की की मृत्यु के बाद जैसी नाइंसाफी दिखाई गई, उससे तो मानो देश में लोगों के सब्र का बांध ही टूट गया। उसकी लाश परिजनों को उनकी गुहार के बावजूद नहीं दी गई, उन्हें घरों में बंद कर दिया गया और रात 2 से 3 बजे के बीच अंतिम संस्कार कर दिया गया। आरोप तो यह है कि पेट्रोल या किरासन तेल डालकर जला दिया गया। इस दहशतनाक घटना पर हाइकोर्ट के न्यायाधीश पंकज मित्तल और राजीव राय की पीठ ने स्वतः संज्ञान लिया था।

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November 02, 2020