दो नेता, दोनों लाए बदलाव
Outlook Hindi|November 02, 2020
दो नेता, दोनों लाए बदलाव
लालू और नीतीश चाहे साथ रहे या अलग, दोनों राज्य में अहम, अब दोनों के सामने चुनौतियां
डॉ. शैबाल गुप्ता

बिहार विधानसभा चुनावों का ऐलान हो चुका है। राज्य में तीन चरणों में मत डाले जाएंगे और 10 नवंबर को नतीजों का ऐलान होगा। इस बार का चुनाव कई मायने में खास है। कोविड-19 के साये में यह देश का पहला चुनाव होगा, जब पूरा प्रचार एक तरह से डिजिटल या वर्चुअल होगा। जाहिर है इसके बाद से भारत में चुनाव प्रचार का तरीका बदलने वाला है। कुछ हद तक इस बदलाव के दौर की तुलना अमेरिकी चुनाव के 'जॉन केनेडी मोमेंट' से की जा सकती है। उस वक्त केनेडी ने अपने प्रतिद्वंद्वी निक्सन को टेलीविजन में हुई बहसों के आधार पर चुनावों में मात दी थी और उसके बाद से अमेरिकी चुनाव में टेलीविजन अहम हिस्सा बन गया। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि केनेडी को 'टेलीविजन राष्ट्रपति' कहा जाने लगा। इन परिस्थितियों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की तुलना करना किसी चुनौती से कम नहीं है।

शुरुआत लालू प्रसाद से करते हैं। वे जेल में हैं, इसलिए इस माध्यम का बहुत फायदा नहीं उठा सकेंगे। वे जमीनी चुनाव अभियान ज्यादा करते रहे हैं, ऐसे में उनके लिए नए माध्यम से सामंजस्य बिठाना आसान नहीं होगा। लालू के विपरीत नीतीश कुमार वर्चुअल चुनाव प्रचार के लिए पहले से तैयार हैं, जिसमें मुद्दों को अपने अनुसार मतदाताओं के सामने रखने की उनकी खासियत बहुत कारगर होगी। अगर पिछले चुनाव का विश्लेषण किया जाए तो उस वक्त लालू प्रसाद यादव ने 246 और नीतीश ने 243 रैलियां की थीं।

दुर्भाग्य से 2020 का चुनाव मुख्य रूप से सीटों के बंटवारे और चुनाव बाद कौन मुख्यमंत्री बनेगा, इन्हीं मुद्दों के चारों तरफ घूम रहा है। दोनों गठबंधन प्रचार के दौरान न्यूनतम कार्यक्रम और घोषणा पत्र पर बहुत कम जोर दे रहे हैं। बिहार चुनाव में सबसे गंभीर बात यह है कि राजनीतिक दल दिखाने के लिए भी विचारधारा की बात नहीं कर रहे हैं, जबकि किसी राज्य के विकास और उसके लिए बनाई जाने वाली नीतियों में विचारधारा का होना सबसे जरूरी तत्व है। हम कहां जाएंगे उसकी दिशा तय करने में राज्य और बाजार दोनों का बेहद महत्व होता है। विचारधारा को किस तरह से ताक पर रख दिया गया है, इसे समाजवादी आंदोलन से निकले स्वर्गीय रघुवंश प्रसाद सिंह द्वारा लालू प्रसाद यादव को लिखे पत्र से समझा जा सकता है। बिना किसी का नाम लिए उन्होंने अपने पत्र में लिखा, "कैसे एक परिवार के पांच लोगों ने पोस्टर पर महात्मा गांधी, बी.आर.आंबेडकर, जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर जैसे महानायकों की जगह ले ली है।" दूसरी तरफ, नीतीश कुमार के गुरु जॉर्ज फर्नांडीस अगर आज जिंदा होते तो उन पर भी कीचड़ उछाला जा रहा होता। उनकी सहयोगी जया जेटली को 2001 के रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के मामले में दिल्ली की अदालत ने हाल ही दोषी ठहराया है। जेटली पर यह फैसला एक न्यूज चैनल का स्टिंग ऑपरेशन सामने आने के बाद आया है।

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