नए गणित, नई चुनौतियां
Outlook Hindi|November 02, 2020
नए गणित, नई चुनौतियां
" "इस बार तेजस्वी तय है, इस बार तेजस्वी तटा...
गिरिधर झा

बिहार के सुदूर इलाकों में आजकल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के चुनावी अभियान का यह गीत खूब बज रहा है, जिसमें यह कहा जा रहा है कि तेजस्वी प्रसाद यादव के लिए राज्य की सत्ता की कमान हाथ में लेने का वक्त आ गया है। राजद, कांग्रेस और वाम दलों के महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी, सत्ताधारी जद (यू) और भाजपा की ताकतवर और मिलीजुली सेना के खिलाफ विपक्ष का जोशोखरोश के साथ नेतृत्व कर रहे हैं। लेकिन बिहार की जटिल चुनावी प्रक्रिया का यह महज एक छोटा-सा विवरण है। दरअसल, ऐसा चुनाव बिहार ने कभी नहीं देखा है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इस पर कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी के बादल मंडरा रहे हैं। पिछली बार राज्य की जनता ने नई विधानसभा के गठन के लिए मतदान किया था, तो लालू प्रसाद जमानत पर बाहर थे, जद (यू), राजद और कांग्रेस एक साथ थे, दलित आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक, रामविलास पासवान जीवित थे और सुशांत सिंह राजपूत कोई चुनावी मुद्दा नहीं था। पांच साल राजनीति में बहुत लंबा समय है, और 15 सालजितने समय से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य के सिंहासन पर काबिज हैंतो जीवन भर की तरह है।

शायद यही कारण है कि राजद के बचे हुए कुछ पारंपरिक गढ़ों में उसके समर्थक 30 वर्षीय नेता को सत्ता में लाने के लिए संघर्षरत हैं। उन्हें उम्मीद है कि तेजस्वी नीतीश कुमार को 1, अणे मार्ग से विदा करके मुख्यमंत्री के बंगले को पुनः हासिल करने के मिशन को पूरा करेंगे, जहां उन्होंने लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान अपने जीवन के प्रारंभिक वर्ष बिताए थे। अपने पिता के उत्तराधिकारी के रूप में तेजस्वी के चुने जाने से बहुत पहले, वे पटना के लुटियंस जोन कहे जाने वाले इलाके में स्थित इस बंगले में 1990 और 2005 के बीच रहते थे, जहां अब नीतीश का आधिकारिक निवास है। उस दौरान उनका ज्यादा समय किताबों से दूर गेंद और बल्ले के साथ वहां के लॉन में बीतता था। उसी परिसर में उन्होंने अपने क्रिकेट कौशल को निखारा, जिसकी बदौलत उन्हें बाद में झारखंड रणजी टीम और इंडियन प्रीमियर लीग के दिल्ली डेयरडेविल्स में जगह मिली।

लेकिन जब लालू को यह एहसास हुआ कि उनका अपना राजनैतिक भाग्य और भविष्य चारा घोटाले में लंबे समय से लंबित मुकदमों से जुड़ा है, तो उन्हें अपने बेटे के लिए मैचों के दौरान 12वें खिलाड़ी के रूप में मैदान में ड्रिंक्स परोसने की तुलना में राजनीति में बेहतर संभावनाएं दिखाई दी। नतीजतन, उन्होंने तेजस्वी को वापस बुला लिया, और एक बिलकुल अलग तरह के खेल, राजनीति के लिए पैड बांधने को कहा। वे तब मुश्किल से 20 वर्ष के थे।

लगभग दस वर्ष बाद, बिहार में 28 अक्टूबर से शुरू हो रहे तीन चरण के मतदान में तेजस्वी नीतीश को लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की उपलब्धि से वंचित करने के लिए महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं। अगर वे इस बार नीतीश को सत्ता से बेदखल करने में सफल होते हैं तो उन्हें देश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त होगा। लेकिन यह आसान नहीं है। उनकी लड़ाई लालू प्रसाद के समकालीन और उन्हीं की तरह जेपी आंदोलन से निकले हुए एक ऐसे सियासी योद्धा के खिलाफ है, जिसे ऐसे चुनावी रण में जाने का लंबा अनुभव है। नीतीश कुमार की जद (यू) राज्य में 15 साल से अजेय रही है; चाहे वह भाजपा के साथ लड़ी हो, उसे छोड़ कर राजद-कांग्रेस के साथ 'धर्मनिरपेक्ष' सहयोगी बनी हो या फिर भाजपा के पास फिर लौटी हो। इस बार, भाजपा के अलावा उसके साथ महादलित नेता जीतन राम मांझी और अत्यंत पिछड़ी जातियों (ईबीसी) के अगुआ मुकेश सहनी भी एनडीए का जनाधार बढ़ाने के लिए जुटे हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि नीतीश अब भी एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता समझे जाते हैं, जिनकी प्रशासनिक क्षमता और जाति-ग्रस्त राज्य की राजनीति में जमीनी हकीकत की गहरी समझ रखने की काबिलियत के लोग कायल हैं। इन सब कारणों से पिछले किसी भी चुनाव में उन्हें सत्ता-विरोधी लहर का सामना नहीं करना पड़ा है। लेकिन क्या इस बार कुछ अलग होने की संभावना है ?

विपक्ष को लगता है इसकी संभावना प्रबल है। उसके अनुसार, नीतीश कुमार का मौजूदा कार्यकाल सृजन जैसे गैर-सरकारी संगठन के घोटाले और मुजफ्फरपुर बालिका आश्रय गृह में हैवानियत जैसी घटना के साथ-साथ लॉकडाउन के दौरान कोविड और प्रवासी मजदूरों के पलायन से उत्पन्न स्थिति से कथित रूप से ठीक से नहीं निपटने के कारण, बेदाग नहीं रहा है। इसके अलावा, उसे यह भी उम्मीद है कि एनडीए खेमे के भीतर मौजूद 'नीतीश के आतंरिक दुश्मन' भी उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं, जिसका लाभ उसे मिलेगा। आश्चर्य नहीं, उनके खिलाफ चाकू की धार तेज की जा रही है और उनके कवच को भेदने की पूरी तैयारी चल रही है।

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November 02, 2020