बड़े बेनजर छोटे पर फंदा
Outlook Hindi|October 05, 2020
बड़े बेनजर छोटे पर फंदा
नशे का गोरखधंधा देश में तकरीबन 10 लाख करोड़ रुपये का होने का अनुमान मगर सरकारी एजेंसियों को प्रतिबंधित मादक पदार्थों के धंधेबाजों और गिरोहों के पीछे नहीं, छोटी मछलियों पर फंदा डालने में दिलचस्पी
भावना विज-अरोड़ा

हल्की पीली, धुंधली-सी रोशनी में धुएं के उठते गुबार के बीच किसी पश्चिमी रॉक ऐंड रॉल धुन पर हीरो और हां, एक शोख हसीना के इर्दगिर्द धमाल जारी है। इससे आपको सत्तर के दशक की कोई फार्मूला फिल्म याद आ जाएगी, जो बहुत-से भारतीयों के जेहन में नशे की काली दुनिया का स्वरूप उभारती है। यह अलग बात है कि भारतीय सिनेमा हकीकत का आईना बमुश्किल ही दिखाता है। इसमें आधुनिकता' और खासकर 'एलीट वर्ग' और उसकी 'पापी' जिंदगी के प्रति हिकारत की छौंक लग जाए तो प्रतिशोध की विचारधारा ठाठे मारने लगती है। सो, अगर अचानक कोई धनी-मानी हाथ लग जाए तो थोड़े समय के लिए असली समस्या पीछे ठेल दी जाती है और इस तरह अंतरराष्ट्रीय तस्करी, तीखे नशे की गोलियां और रासायनिक मादक पदार्थों का धंधा, किशोर-किशोरियों को लगती लत सब पर परदा पड़ जाता है।

जरा इन दो घटनाओं का फर्क और उन पर सरकारी एजेंसियों और लोगों की प्रतिक्रिया पर गौर कीजिए, जिससे अंदाजा लगता है कि हम असली समस्या के प्रति कितने गंभीर हैं और आखिर हमारी नजर कहां है।

• पहली यकीनन अंतहीन मीडिया ट्रायल की शिकार एक्ट्रेस रिया चक्रवर्ती की है, जिसे आखिरकार "ड्रग्स सिंडिकेट का सक्रिय सदस्य" होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। मामला सह-आरोपियों करन अरोड़ा और अब्बास रमजान अली लखानी के पास से मिले महज 59 ग्राम मारिजुयाना पर टिका है। मारिजुयाना या गांजा भारत में अपेक्षाकृत एक हल्के पारंपरिक नशे की वस्तु है, जिसके प्रति धीरे-धीरे दुनिया भर में नजरिया बदलता जा रहा है और कानूनी तथा मेडिकल वर्जनाएं हल्की पड़ने लगी हैं। रिया कथित तौर पर वह वस्तु हासिल करने के लिए 10 साल की सजा पा सकती हैं, जिसे 2015 में लगभग आधा अमेरिका चख चुका है।

• दूसरा मामला तो नशे के ठेकेदारों के गिरोह का है। हां, हल्की-सी देसी छौंक के साथ। सुशांत सिंह राजपूत-रिया चक्रवर्ती प्रकरण के सुर्खियों में छाने के करीब दस महीने पहले मैक्सिको के सिनालोआ कार्टेल परिवार के कुछ सदस्य जयपुर आए थे। बेशक, दावा यही था कि वे पर्यटन के लिए आए। सिनालोआ को अमेरिकी सरकार "दुनिया भर में ड्रग सप्लाई के लिए अब तक का सबसे ताकतवर ड्रग सिंडिकेट" बताती है। उस वक्त खुफिया एजेंसियों ने सिनालोआ कार्टेल के सदस्यों की यात्रा पर सतर्क किया था, लेकिन किसी भी सरकारी एजेंसी ने उस अलर्ट पर हरकत में आने की जहमत नहीं समझी। उन एजेंसियों में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) भी था। और बेशक, मीडिया में भी कहीं कोई हरकत नहीं हुई। सिनालोआ सिंडिकेट मुख्य रूप से कोकीन, हेरोइन और मेथाफेटामाइन जैसे कड़े नशे का धंधा करता है।

इन दोनों घटनाओं में एजेंसियों की प्रतिक्रिया का फर्क हैरान करने वाला है, और इससे पता चलता है कि पूरा तंत्र कैसे काम करता है। जयपुर होटल के बाहर न तो कैमरेवालों की धक्का-मुक्की हुई, न प्राइम टाइम पर सूत्रों के हवाले से खुलासे हुए। दरअसल, असली अपराधियों पर फंदा डालने के लिए ऐसा कुछ होता भी नहीं है, उसमें तो खुफिया तंत्र चुपचाप काम करता है। सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, "सिनालोआ कार्टेल के सदस्य भारत में क्यों आए थे, उनकी जयपुर यात्रा के पीछे की कहानी क्या है, वे यहां किन लोगों से मिले, इन सब चीजों को जानने की कोई कोशिश नहीं की गई।"

इसी तरह, नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटरिएट (एनएससीएस) ने एनसीबी को अफगानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर पर ड्रग का काला धंधा करने वाले अफगान ड्रग माफिया लॉर्ड हाजी सलीम के बारे में जानकारी दी थी। ऐसा माना जाता है कि भारत में हेरोइन की बड़ी खेप में तस्करी का जिम्मेदार सलीम ही है। पिछले चार वर्षों में भारत में हेरोइन की खेप एक बार में 100 किलोग्राम से लेकर 1500 किलोग्राम तक पकड़ी गई है। एजेंसियों का मानना है, यह सभी हेरोइन सलीम के जरिए ही आई थी। सूत्रों के अनुसार, सलीम भारत में हेरोइन की ज्यादातर तस्करी अरब सागर के रास्ते करता है। एक सूत्र ने आउटलुक को बताया, "इतना गंभीर मामला होने के बावजूद लगता है कि सलीम को पकड़ने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस भी नहीं जारी किया गया है।"

यह लापरवाही बिलाशक गंभीर है और कड़े नशे की तस्करी के सभी डेटा यही बताते हैं कि इसकी उपलब्धता कठिन नहीं है। इसलिए कई जानकारों को संदेह होता है कि अनेक स्तरों पर सांठगांठ जारी है। एनसीबी का ध्यान इस पर तो नहीं या कम दिखता है, जबकि हाई-प्रोफाइल मामलों को वह फौरन लपक रही है।

अमूमन यह एजेंसी व्यक्तियों के पास थोड़ी-बहुत नशे की खपत पर हाथ नहीं डालती है। इस देश में गांजा, भांग, चरस और कुछ हद तक अफीम का इस्तेमाल संस्कृति का हिस्सा है, इसलिए अधिकारी व्यक्तिगत खपत के मामलों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। एम्स में नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (एनडीडीटीसी) के 2019 के एक सर्वेक्षण का अनुमान है कि देश में 3.1 करोड़ लोग मारिजुयाना का सेवन करते हैं। मुंबई पुलिस के नारकोटिक्स सेल के एक अधिकारी कहते हैं, "अगर हम ऐसे लोगों पर कार्रवाई करने लगें तो हरिद्वार और पुरी में रहने वाले साधु जो अपनी चिलम में गांजा भर कर पीते हैं, पुष्कर मेले में आने वाले पर्यटक जो चरस का सेवन करते हैं, होली के मौके पर भांग का इस्तेमाल करने वाले, राजस्थान में शादियों और दूसरे सामाजिक आयोजनों में अफीम का इस्तेमाल करने वाले सभी गिरफ्तार हो जाएंगे।" वे हंसते हुए हल्के-फुल्के ढंग से कहते हैं, 'अगर एनसीबी बॉलीवुड में ड्रग का इस्तेमाल करने वालों पर कार्रवाई करने लगे तो समझ लीजिए मुंबई की सबसे बड़ी इंडस्ट्री खत्म हो जाएगी।"

मुंबई के चर्चित पूर्व पुलिस प्रमुख जुलिओ रिबेरो का भी मानना है कि एनसीबी का काम ड्रग का इस्तेमाल करने वालों को पकड़ना नहीं है। वे कहते हैं, "मेरी राय में लोगों को गिरफ्तार करने की जगह उन्हें काउंसलिंग देने की जरूरत है, ताकि वे ड्रग का सेवन छोड़ने के लिए प्रोत्साहित हो सकें। रिया तो बड़े खेल में केवल एक मोहरा है, जो इस समय राजनीति का खेल दिखता है। इस खेल में कई बड़ी मछलियां हैं, एनसीबी को उन्हें पकड़ना चाहिए।"

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