जरूरतमंदों को मदद नहीं

Outlook Hindi|July 13, 2020

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जरूरतमंदों को मदद नहीं
बैंक उन्हीं उद्यमियों को कर्ज दे रहे जिनकी माली हालत पहले से अच्छी
एस.के. सिंह

लॉकडाउन से मरणासन्न हुए लघु, छोटे और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 13 मई 2020 को 3.7 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी। इसमें से तीन लाख करोड़ रुपये बिना कुछ गिरवी रखे एमएसएमई को कामकाजी पूंजी का कर्ज देने के लिए हैं। इस प्रस्ताव को कैबिनेट की मंजूरी मिले एक महीना और लॉकडाउन के तीन महीने बीत जाने के बाद स्थिति यह है कि इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) के तहत 20 जून तक 79,000 करोड़ रुपये के कर्ज स्वीकृत हुए और इसमें से वास्तव में 35,000 करोड़ रुपये दिए गए। महज तीन हफ्ते में इतना कर्ज निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिनआउटलुक ने इस सिलसिले में सबसे ज्यादा एमएसएमई वाले राज्यों के उद्योग संगठनों से बात की, तो कुछ और कहानी सामने आई। कोलेटरल- फ्री लोन होने के बावजूद बैंक कहीं कोलेटरल मांग रहे हैं, तो कहीं उद्यमियों की निजी गारंटी ले रहे हैं। नियम तो है कि उद्यमियों को बस एक आवेदन करना होगा जिसके आधार पर उनका कर्ज मंजूर होगा, इसके विपरीत बैंक सामान्य दिनों की तरह पूरे कागजात मांग रहे हैं। एमएसएमई में जो मझोले उपक्रम हैं, इस स्कीम के तहत बैंक उन्हें ही ज्यादा कर्ज दे रहे हैं। इनकी माली हालत पहले से ही अच्छी है। बैंक इन उद्यमियों को तो अपनी तरफ से फोन करके कर्ज देने की बात कह रहे हैं, लेकिन जिनकी स्थिति पहले खराब थी और लॉकडाउन में जो बंदी के कगार पर पहुंच गए, उन्हें बैंकों से कोई मदद नहीं मिल रही है।

देश के 6.3 करोड़ एमएसएमई में 99 फीसदी उद्यम लघु श्रेणी के हैं जो बैंकों से कामकाजी पूंजी के लिए कर्ज कम ही लेते हैं, जबकि नियम बना है कि नई स्कीम के तहत कर्ज उन्हीं को मिलेगा जिन्होंने पहले से कर्ज ले रखा है। इसलिए करोड़ों उद्यमी स्कीम के दायरे से बाहर हो गए हैं। आश्चर्य नहीं कि कुछ महीने बाद इनमें से अनेक के बंद हो जाने की खबरें आएं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का आकलन है कि 2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पांच फीसदी गिरावट से बड़ी कंपनियों का राजस्व 15 फीसदी और एमएसएमई का 21 फीसदी तक घट सकता है। इससे छोटी कंपनियों के सामने अस्तित्व का संकट होगा। एसपी जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट रिसर्च और मैगमा फिनकॉर्प के एक सर्वे के अनुसार, कोविड-19 के कारण करीब 50 फीसदी एमएसएमई का कारोबार 20 से 50 फीसदी तक कम हो गया है, इसलिए 51 फीसदी उद्यमियों ने कहा कि वे फिलहाल कर्ज नहीं लेंगे।

सरकार की तरफ से बैंकों को जो गारंटी दी जानी है, उसके लिए अथॉरिटी बनाने में करीब तीन हफ्ते लग गए। इसलिए शुरू में इस स्कीम के तहत कर्ज नहीं मिल पा रहा था। कहा गया था कि उद्यमियों को कर्ज के लिए सिर्फ एक आवेदन करना होगा, लेकिन वास्तव में उनसे सभी कागजात मांगे जा रहे हैं। कुछ उद्यमियों से निजी गारंटी भी ली जा रही है। हालांकि, कुछ बैंकों का रवैया जरूर लचीला है। दिल्ली स्थित एमएसएमई डेवलपमेंट फोरम के चेयरमैन रजनीश गोयनका कहते हैं, "आखिर लोन देने वाले अधिकारी तो वही पुराने हैं। उन्हें यह डर भी है कि कल सरकार उनसे यह न पूछ ले कि कर्ज देते समय कंपनी का धंधा क्यों नहीं देखा।"

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July 13, 2020