छत्तीसगढ़ में हाथियों पर कहर

Outlook Hindi|July 13, 2020

छत्तीसगढ़ में हाथियों पर कहर
राज्य के घने जंगलों में कोयला खदानों की इजाजत से जंगल उजड़े तो हाथियों और आदमी के बीच मुठभेड़ की वारदातें भी बढ़ी
रवि भोई

छत्तीसगढ़ में गजराज पर आफत आन पड़ी है। जून के एक ही हफ्ते में यहां छह हाथियों की मौत ने वन्यप्राणी सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक गर्भवती हथिनी की मौत के साथ शुरू हुआ यह सिलसिला, खूखार माने जाने वाले गणेश हाथी की मौत तक थमा नहीं है। इससे सरकार और समाज पर अंगुलियां उठ रही हैं। कोयला और दूसरे खनिज पदार्थों के खनन के साथ आदिवासियों को वन पट्टे देने से यहां जंगल सिकुड़ रहा है और भारी-भरकम वन्यजीव हाथी के स्वच्छंद विचरण में बाधा आ रही है। हाथी भोजन की तलाश में गांवों की ओर रुख करते हैं और इंसानों के साथ उनका संघर्ष शुरू हो जाता है। हाथियों को धान की फसल और महुआ लुभाता है। किसान और आदिवासी फसलों की रक्षा के लिए पटाखे फोड़कर या कंडे पर मिर्च का धुआं करके उन्हें भागते हैं।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके सरगुजा-जशपुर और कोरबा में हाथियों का निवास है। महासमुंद, धमतरी और गरियाबंद जिले में हाथियों का झुंड ओडिशा से आता है। इस झुंड के हाथी भटक कर कभी-कभार राजधानी रायपुर की सीमा में भी आ जाते हैं। 41 फीसदी से अधिक वन क्षेत्र वाले सरगुजा-जशपुर और कोरबा जिले में घने जंगल हैं, इन्हीं इलाकों में कोयला खदानें भी हैं। कोयला खदानों के कारण जंगल कट रहे हैं और हाथियों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो रहा है। एक वयस्क हाथी रोजाना 300 से 400 किलो तक फल- पत्ते और दूसरी चीजें खा जाता है। उसे एक दिन में डेढ़ सौ लीटर पानी की भी जरूरत होती है। इस कारण हाथी ऐसी जगह की तलाश करते हैं, जहां उन्हें निरंतर भोजन और पानी मिल सके।

वन्यजीवों के जानकार प्राण चड्डा बताते हैं कि 1986 के पहले तक छत्तीसगढ़ में हाथी नहीं थे। 1986 में सूखा पड़ने के कारण हाथी ओडिशा और झारखंड से सरगुजा होते हुए मध्य प्रदेश के सीधी तक जा पहुंचे। तब सरकार ने चार हाथियों को पकड़कर बांधवगढ़ नेशनल पार्क में रख दिया था, लेकिन हाथियों का दल पार्क में घुसकर उन्हें निकाल लाया। छत्तीसगढ़ के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक आर.के. सिंह कहते हैं, "मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने हाथियों को राज्य से खदेड़ने की नीति अपनाई। 2000 तक इस इलाके में हाथी नहीं आए, इसके बाद फिर आने लगे।" ये झारखंड से निकलकर छत्तीसगढ़ होते ओडिशा चले जाते थे। चारा-पानी के कारण कुछ सरगुजा के जंगलों में रुक गए, सरकार ने भी उन्हें नहीं भगाया। 2002 में राज्य में 22 हाथी थे। वर्तमान में इनकी संख्या 300 तक पहुंच गई है। हाथी को बुद्धिमान और संवेदनशील वन्य प्राणी कहा जाता है। इसकी सूंघने की क्षमता जबर्दस्त होती है। यह जिस रास्ते आता है, उसी रास्ते चला भी जाता है लेकिन चारा इसके लिए महत्वपूर्ण होता है। जहां उसे फल, पत्ते और पानी मिल जाता है, वह वहीं रुक जाता है।

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July 13, 2020