झारखंड का लजीज जायका

Outlook Hindi|July 13, 2020

झारखंड का लजीज जायका
मशरूम प्रजाति के रुगड़ा में भरपूर पोषक तत्व हैं मगर बरसात के तीन महीने ही मिलता है और मुंह को स्वाद लग जाए तो बार-बार तलाशेंगे
नवीन कुमार मिश्र

मटन और शाकाहारी! सुनकर ही आप हैरत में पड़ सकते हैं। मगर झारखंड के रुगड़ा की पहचान इसी रूप में है। इसे पुटु भी कहते हैं। यह छोटे आकार के आलू की तरह का होता है। रांची के कुछ खास सब्जी बाजारों में बरसात के समय चंद लोग टोकरियों में रखकर इसे बेचते हुए आपको दिख जाएंगे। यह मशरूम की प्रजाति का है मगर इसकी खेती नहीं होती। यहां के जंगलों में साल या कहें सखुआ के वृक्ष बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं. वहीं जमीन के भीतर से यह निकलता है। जंगल के मिजाज से वाकिफ ग्रामीणों, आदिवासियों को बारिश के मौसम में साल के पेड़ के नीचे दरार देखकर भान हो जाता है कि यहां रुगड़ा है। जमीन से चंद इंच नीचे से इसे खोदकर निकाला जाता है। मटन या चिकन की तरह इसे बनाया जाता है। सावन के महीने में जब लोग मांसाहार त्यागते हैं, उस वक्त का यह पसंदीदा व्यंजन है। जून से सितंबर के प्रारंभ तक यह उपलब्ध होता है। शुरू में इसकी कीमत करीब आठ सौ रुपये किलो होती है, बाद में गिरकर ढाई-तीन सौ रुपये रह जाती है। इसमें प्रोटीन और फाइबर अधिक होता है लेकिन फैट और कैलोरी कम होती है। दो-तीन दिनों में ही यह खराब होने लगता है। इसी कारण बड़े शहरों की थाली तक इसकी पहुंच नहीं हो सकी है। झारखंड से बाहर बड़े शहरों में रहने वाले ज्यादातर लोग इसे जानते भी नहीं हैं, न ही इसके जायके और गुणों से वाकिफ हैं। इसे बड़े शहरों तक पहुंचाने की कवायद चल रही है। अभी तक इसके पोषक तत्व के संबंध में कायदे से शोध परिणाम सामने नहीं आ सका है। हालांकि दूसरे मशरूम के बारे में काफी शोध हुए हैं। साल में तीन महीने उपलब्ध रहने वाला रुगड़ा जमाने से आदिवासियों का पसंदीदा खाद्य पदार्थ रहा है।

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July 13, 2020