राहत का भुलावा

Outlook Hindi|June 15, 2020

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राहत का भुलावा
सरकार के दावों से विशेषज्ञों की घोर असहमति, मांग बढ़ाए बिना अर्थव्यवस्था पटरी पर कैसे आएगी

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने 22 मई को मौद्रिक नीति की समीक्षा के बाद जब कहा कि 2020-21 में भारत की विकास दर शून्य से नीचे रह सकती है, तो यह एक तरह से इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि राहत पैकेज के नाम पर केंद्र सरकार की घोषणाओं का तत्काल कोई असर नहीं होने वाला है। लॉकडाउन के चलते मैन्युफैक्चरिंग एमएसएमई के अलावा होटल, रेस्तरां, पर्यटन, कंस्ट्रक्शन और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टर में करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं। सरकार ने चुनिंदा उद्योगों के लिए राहत का ऐलान किया है, लेकिन इनसे मांग नहीं बढ़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार सरकार के फैसले आपूर्ति बढ़ाने वाले हैं, जबकि जरूरत आपूर्ति और मांग दोनों बढ़ाने की थी। उनका कहना है कि अगर सरकार ने जल्दी ही मांग बढ़ाने का पैकेज घोषित नहीं किया तो अर्थव्यवस्था की हालत और बिगड़ जाएगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 मई को ऐलान किया कि अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये का 'आत्मनिर्भर भारत' पैकेज दिया जाएगा। इसके बाद पांच दिनों तक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पैकेज का खुलासा करती रहीं। हालांकि उन्होंने पांच दिनों में ऐसा कुछ नहीं कहा जिसे एक दिन में नहीं कहा जा सकता था। आखिर इससे ज्यादा घोषणाएं बजट में कुछ ही घंटों में कर दी जाती हैं। उन्होंने पैकेज के रूप में 20.97 लाख करोड़ रुपये गिना दिए, पर इसमें कुछ घोषणाएं पुरानी थीं तो कुछ तथाकथित सुधारवादी फैसले थे।

इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज में मैलकम आदिशेषैया चेयर प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, "पैकेज में तमाम नीतियां बदलने की बात है जिनका असर लंबे समय में दिखेगा, जबकि जरूरत तत्काल राहत की है। इस पैकेज के जरिए सत्तारूढ़ पार्टी अपने उस एजेंडे को बढ़ा रही है जिसे वह 2014 में सत्ता में आने के बाद से लागू नहीं कर पाई थी।" लॉकडाउन से प्रभावित एक बड़े वर्ग के लिए पैकेज में बहुत थोड़ी बाते हैं। 22 राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पैकेज को देश के लिए एक क्रूर मजाक बताया। दूसरे दलों ने भी इनकम टैक्स दायरे से बाहर के परिवारों को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर देने की मांग की। जब कर्ज को भी राहत पैकेज बताने पर सवाल उठे तो वित्त मंत्री ने दलील दी कि भारत ऐसा करने वाला एकमात्र देश नहीं है। लेकिन ऐसा कहते वक्त वित्त मंत्री यह भूल गईं कि किसी भी देश के पैकेज का 90 फीसदी हिस्सा कर्ज नहीं है। राजनीतिक विरोधियों की बात छोड़ भी दें तो शायद ही किसी अर्थशास्त्री या उद्योग विशेषज्ञ ने इसे राहत पैकेज माना हो। प्रधानमंत्री ने कहा था कि राहत पैकेज जीडीपी का 10 फीसदी है, लेकिन विशेषज्ञों ने इसे 0.7 से 1.3 फीसदी तक माना है। आउटलुक से बातचीत में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर लेबर में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा ने कहा कि पैकेज वास्तव में जीडीपी का एक फीसदी है। एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने आउटलुक से कहा, "मांग बढ़ाने के लिए कुछ न कुछ सपोर्ट होना चाहिए। गरीब कल्याण योजना के अलावा भी कमजोर वर्ग को सीधी मदद की जरूरत है। जनधन खातों के जरिए नकदी ट्रांसफर की जानी चाहिए। मेरे विचार से मांग और आपूर्ति दोनों के लिए कदम उठाए जाते तो बेहतर होगा।"

क्या है राहत पैकेज

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June 15, 2020