उपलब्धियों पर भारी चुनौतियां

Outlook Hindi|June 15, 2020

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उपलब्धियों पर भारी चुनौतियां
मौजूदा दौर में कोविड महामारी और लॉकडाउन से बदहाली के अलावा मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले साल में खट्टे-मीठे अनुभव
हरवीर सिंह

मई 2019 की 30 तारीख और 30 मई 2020 का फर्क क्या है? तब राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की शपथ ली तो इतिहास दोहराया जा रहा था। आजाद भारत के इतिहास में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेने वाले मोदी पहले गैर-कांग्रेसी और गांधी-नेहरू परिवार से अलग पहने नेता भी बने। स्वाभाविक है कि इसकी तुलना इंदिरा गांधी के मार्च 1971 के चुनावों में जीत से भी की जाती, क्योंकि उस चुनाव में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ', बैंकों के राष्ट्रीयकरण समाप्त करने जैसे बड़े फैसलों के बूते कांग्रेस (आर) को लोकसभा की 352 सीटों पर जीत दिलाई थी। नरेंद्र मोदी ने भी अपने पहले कार्यकाल में कुछ गरीबोन्मुखी योजनाओं पर अमल किया और उनकी लोकप्रियता के सामने लोकसभा चुनाव में विपक्ष टिक नहीं सका। नतीजतन, 2019 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा की 303 सीटें और उसके गठबंधन एनडीए को 353 सीटों पर जीत हासिल हुई। शपथ ग्रहण समारोह में देश भर से भाजपा पदाधिकारी और कार्यकर्ता बुलाए गए थे और पार्टी का आत्मविश्वास चरम पर था। लेकिन साल भर बाद 30 मई 2020 को वह उत्साह और आत्मविश्वास कमजोर दिख रहा है। पार्टी दूसरे कार्यकाल के एक साल की बजाय मोदी सरकार के छह साल का जश्न मना रही है। इस विडंबना की वजहें भी जाहिर हैं।

आखिर कोविड-19 महामारी के चलते लागू देशव्यापी लॉकडाउन के बाद पैदा हुई प्रतिकूल सामाजिक और आर्थिक स्थितियां भयावह मुकाम पर जा पहुंची हैं। मुख्यधारा के समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया में पैदल, साइकिल, ट्रकों-टेंपू, बसों और कुछेक श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से जैसे-तैसे, मरते-जूझते हजारों किलोमीटर दूर अपने गांव-घर जाते गरीब और मजदूरों की विचलित करने वाली तसवीरें और वीडियो भरे पड़े हैं। शायद यह भी एक वजह है कि शुरू में उनकी मदद से जुड़ी याचिकाओं को सुनने योग्य न मानने वाले सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर 26 मई को इस मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया (हालांकि ये भी खबरें हैं कि तकरीबन 20 नामी- गिरामी वकीलों की तीखी चिट्ठी के बाद सुप्रीम कोर्ट का दिल पसीजा)। लेकिन इन छवियों के बावजूद भाजपा छह साल की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए 750 वर्चुअल रैलियां आयोजित कर रही है।

अब फिर जरा पीछे लौटिए। 1971 में इंदिरा गांधी देश में करिश्माई और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता बन चुकी थीं। मार्च में लोकसभा चुनाव विशाल बहुमत से जीतने के बाद दिसंबर, 1971 में पाकिस्तान से युद्ध में निर्णायक जीत और उसके परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश नामक नया राष्ट्र बनाने की उपलब्धि ने इंदिरा गांधी के प्रशंसकों में विपक्ष को भी खड़ा कर दिया था। उत्तर प्रदेश में जनवरी, 1972 में चौधरी चरण सिंह की पार्टी बीकेडी के कई विधायक और कद्दावर नेताओं ने पार्टी छोड़ते वक्त तर्क दिया कि कांग्रेस एक प्रोग्रेसिव फोर्स है और बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स की समाप्ति जैसे मुद्दों पर चरण सिंह ने इंदिरा गांधी का समर्थन नहीं किया। तब भारतीय जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को “दुर्गा कहा था। लेकिन 2019 में लोकसभा में निर्णायक जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसलों को दो हिस्सों में रखा जा सकता है। एक, राजनैतिक और दूसरा आर्थिक। राजनैतिक फैसलों के मामले में वे संघ की विचारधारा और पार्टी के घोषणापत्र को अमलीजामा पहनाने की तेजी से कोशिश करते दिखते हैं लेकिन आर्थिक मोर्चे पर वे नाकाम होते एजेंडे को लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं।

राजनैतिक एजेंडे की बानगी

पांच अगस्त 2019 का नरेंद्र मोदी सरकार का फैसला कुछ इसी तरह का माहौल बना रहा था। जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाकर उसे दो केंद्रशासित क्षेत्रों में तब्दील कर दिया गया। इस फैसले की आलोचना विपक्ष भी खुलकर नहीं कर सका, बल्कि कई विपक्षी दलों के नेता समर्थन में बयान दे रहे थे। इनमें मोदी के कटु विरोधी, दिल्ली की सत्ता पर काबिज अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी शामिल थी, तो कई कांग्रेसी दिग्गज भी थे। यह घटनाक्रम और माहौल यह साबित करने के लिए काफी था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई थी।

नोटबंदी-जीएसटी का असर जारी

पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार का सबसे कड़ा फैसला नोटबंदी को माना जा सकता है। एक झटके में किए गए इस फैसले ने देश के करोड़ों लोगों को बेरोजगार करने के साथ ही उनके जीवन में भारी अनिश्चितता की स्थिति खड़ी कर दी थी। इतना ही बड़ा फैसला माल व सेवा कर (जीएसटी) लागू करना था, जिससे कारोबार पर भारी असर पड़ा। इन दोनों फैसले के असर आर्थिक क्षेत्र में आज भी दिख रहे हैं। लेकिन मतदाताओं की नब्ज पहचानने वाले और लोगों की भावनाओं को समझने में दक्ष नरेंद्र मोदी ने इस फैसले को गरीब हितैषी दिखाकर राजनीतिक नुकसान नहीं होने दिया। यही वजह रही कि इस फैसले के कुछ माह बाद ही उनके जबरदस्त कैंपेन की बदौलत उत्तर प्रदेश में भाजपा भारी बहुमत से सत्ता में आ गई। साथ ही, पहले कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी कमी के चलते सरकार को करों के मोर्चे पर भारी कमाई हुई और उसका फायदा उन्होंने जनधन योजना, स्वच्छ भारत मिशन के तहत घर-घर शौचालय के निर्माण, गरीबों को मुफ्त में रसोई गैस की उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण), जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा के साथ स्वास्थ्य बीमा की आयुष्मान योजना, प्रधानमंत्री किसान कल्याण निधि जैसे दर्जनों कार्यक्रम चलाए। ये उनके लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हुए और उनको दोबारा भारी बहुमत हासिल करने में सफलता के सूत्र बन गए।

आर्थिकी बदहाल, राजनीति सुखर्ररु

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June 15, 2020