"हालात नोटबंदी काल के संकट से भी ज्यादा गंभीर"

Outlook Hindi|June 15, 2020

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"हालात नोटबंदी काल के संकट से भी ज्यादा गंभीर"
करीब दो महीने के देशव्यापी लॉकडाउन ने करोड़ों लोगों का रोजगार छीन लिया है। अब जब लॉकडाउन में चरणबद्ध तरीके से ढील दी जा रही है, तो लोग एक बार फिर उम्मीद लगाए बैठे हैं। लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर लेबर में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर संतोष मेहरोत्रा का मानना है कि हालात पूर्ववत होने में काफी समय लगेगा। वैसे तो हालात कोविड महामारी के आने से पहले ही अच्छे नहीं थे, पर यह भी सच है कि भारत में बेरोजगारी की समस्या दशकों पुरानी है। प्रो. मेहरोत्रा की संपादित किताब रिवाइविंग जॉब्स, 'एन एजेंडा फॉर ग्रोथ' हाल ही में प्रकाशित हुई है। रोजगार के समूचे परिदृश्य पर उनसे बात की आउटलुक के एस.के. सिंह ने। मुख्य अंश:

सीएमआइई के अनुसार भारत में बेरोजगारी दर रिकॉर्ड 24 फीसदी पर पहुंच गई है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी का सर्वे है कि लॉकडाउन के चलते 67 फीसदी लोगों की नौकरी छिन गई। दो महीने के लॉकडाउन को देखते हुए आपको क्या लगता है?

लॉकडाउन खत्म होने पर कुछ तो सुधार होगा, लेकिन हमें यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि भारत की अर्थव्यवस्था और नौकरियों की स्थिति तत्काल वहां पहुंच जाएगी जहां जनवरी 2020 में थी। स्थिति की गंभीरता को जानने के लिए यह समझना जरूरी है कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। देश में 2018 में बेरोजगारी दर (6.1 फीसदी) 45 वर्षों में सबसे ज्यादा थी। 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 2012 से 2018 के बीच छह फीसदी से बढ़कर 18 फीसदी हो गई। इससे पहले 2004-05 से 2011-12 के बीच बेरोजगारी दर कम हो रही थी, क्योंकि उस दौरान विकास दर काफी बढ़ गई थी। उद्योग, सेवा और कंस्ट्रक्शन जैसे गैर-कृषि क्षेत्र में नौकरियां तेजी से बढ़ रही थीं। हर साल 75 लाख लोगों को नौकरियां मिल रही थीं, लेकिन 2012 से 2018 के बीच यह घटकर 29 लाख रह गई। उसी दौरान, 2012 के बाद पढ़-लिख कर नौकरी के लिए तैयार युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी। स्कूल से लेकर कॉलेज तक, हर स्तर पर एनरोलमेंट बढ़ा। 2007 में छह से 11 साल के बच्चों की प्राथमिक स्तर पर नेट एनरोलमेंट 97 फीसदी हो गई थी। इसका प्रभाव माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर भी दिखा। इसमें मध्यान्ह भोजन योजना का भी योगदान था। राज्य सरकारों की स्कीमों का भी असर था कि मां-बाप ने बेटियों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। 2010 में नौवीं-दसवीं में एनरोलमेंट दर 58 फीसदी थी, वह पांच साल में बढ़ कर 85 फीसदी हो गई। इसका असर उच्च शिक्षा में हुआ, जहां एनरोलमेंट दर 2006 में सिर्फ 11 फीसदी थी, वह 2016-17 में 26 फीसदी पर पहुंच गई। ये बच्चे पढ़-लिख कर 2012 से 2018 के दौरान नौकरी ढूंढ़ने लगे, लेकिन उसी समय नौकरियों के सृजन की दर कम हो गई थी। इस कारण बेरोजगारी दर बढ़ने लगी। बेरोजगारी दर 2018 में ही रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी और सीएमआइई के अनुसार अब यह आंकड़ा 24 फीसदी हो गया है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह विपदा कितनी बड़ी है।

लॉकडाउन के बाद कितनी जल्दी सुधार की उम्मीद करें?

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