"महामारी को सरकार ने महात्रासदी में बदला"

Outlook Hindi|June 15, 2020

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"महामारी को सरकार ने महात्रासदी में बदला"
पहले चंद्रशेखर सरकार और फिर अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री और फिर विदेश मंत्री जैसा अहम जिम्मा संभाल चुके 83 वर्षीय यशवंत सिन्हा 2014 के बाद से ही दलगत राजनीति से बाहर हैं लेकिन बतौर सार्वजनिक शख्सियत वे आज भी सक्रिय हैं। हाल में लॉकडाउन के दौरान गरीब और प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के खिलाफ उन्होंने राजघाट पर लगभग 11 घंटे का धरना और गिरफ्तारी दी। उनकी मांग है कि मजदूरों को उनके घर ससम्मान पहुंचाने के लिए सेना की मदद ली जाए। इस त्रासद दौर की घटनाओं, सरकारी कदमों, राहत पैकेज जैसे तमाम मुद्दों पर उनसे हरिमोहन मिश्र ने बातचीत की। प्रमुख अंशः

लॉकडाउन में समूचे देश में गरीब, मजदूरों के अपने गांव-घर के सफर पर पैदल ही निकल पड़ने की त्रासदी दिख रही है। आपने उन्हें घर पहुंचाने के लिए सेना लगाने की मांग की है। इसके पीछे क्या तर्क है?

तर्क सीधा और साधारण-सा है कि जब-जब कोई आपदा आई है, राहत कार्य के लिए सेना की मदद ली जाती है। देश के कानून में प्रावधान है कि किसी जिले में भी गंभीर समस्या पैदा हो जाती है तो जिलाधिकारी पास के कैंटोनमेंट से सेना को मदद के लिए बुला सकता है। मुझे लगता है और बहुत सारे लोगों को लगता है कि देश में इतने बड़े पैमाने पर एक हिस्से से दूसरे हिस्से में लोगों का पलायन 1947 के बाद नहीं देखा गया। यह 24 मार्च को लॉकडाउन शुरू होने के साथ ही शुरू हो गया था। उसके बाद अप्रैल-मई दो महीने होने जा रहे हैं और लोग तमाम तकलीफें झेलकर सड़कों पर भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने पर मजबूर हैं। बूढ़े, बच्चे, महिलाएं सभी यह त्रासदी झेल रही हैं। सरकार ने लॉकडाउन लगाने के पहले यह सोचा ही नहीं कि पूरे देश को बंद कर देने से कितनी तरह की तकलीफें हो सकती हैं। सबसे पहले यह ध्यान में आना चाहिए था कि जो करोड़ों लोग रोजी-रोटी की तलाश में अपने प्रदेश से दूसरे प्रदेशों में गए हैं, उनका क्या होगा। यह कोई छुपी बात नहीं है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे तमाम राज्यों के लोग उन प्रदेशों में जाते हैं, जो कुछ विकसित हैं। ऐसे में सारे उद्योग-धंधे बंद हो गए और वे भूखों मरने को मजबूर हो गए, तो बड़े शहरों, औद्योगिक केंद्रों वगैरह से पलायन शुरू हुआ। यह समस्या जब सामने आ गई तो 60 दिनों में भी कोई समुचित इंतजाम नहीं किया गया। भारतीय रेल की क्षमता रोजाना तीन करोड़ लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने की है। अब कुछ हजार या एक-दो लाख लोगों को एक दिन में ले जाया रहा है तो जितनी बड़ी संख्या है, उसके मुकाबले यह ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। इसलिए मैंने कहा कि देश की प्रशासनिक मशीनरी इसका हल नहीं निकाल पा रही है, तो सेना से कहा जाए कि वह गरीब मजदूरों को ससम्मान उनके घर पहुंचाए। मैं ससम्मान पर जोर दे रहा क्योंकि उनके साथ अन्याय हो रहा है, उन पर लाठियां बरसाई जा रही हैं, सेनिटाइजर की बौछार की गई, वे औने-पौने दाम देकर ट्रकों, बसों, टेंपू में अपने गांव जाने को मजबूर हैं, यमुना रात में पार कर रहे हैं, क्योंकि पुलिस उन पर डंडा चला रही है। गरीबों की ऐसी दुर्दशा आजादी के बाद कभी भी नहीं देखी गई। भूकंप आए, सूनामी आई, बाढ़, चक्रवात तमाम तरह की आपदाओं से हम निपट चुके हैं लेकिन ऐसी विपत्ति आज तक नहीं आई। इसलिए इतनी बड़ी आपदा में सेना, अर्द्धसैनिक बलों को क्यों न बुलाया जाए? फिर, हाल में सेना के हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए गए, नौसेना के बेड़े में बत्तियां जलाई गईं, अस्पतालों में सेना के जवानों ने स्वास्थ्यकर्मियों को सम्मानित किया। अच्छा किया लेकिन इतनी बड़ी त्रासदी का भी तो समाधान कीजिए। मैं 60 साल के अपने प्रशासनिक और राजनैतिक अनुभव के आधार पर कह रहा हूं कि सेना के हवाले किया जाए, तो 24-48 घंटे के भीतर इसका समाधान हो सकता है।

तो, क्या सरकार ने कोविड महामारी की रोकथाम के लिए जो लॉकडाउन की रणनीति अपनाई, वह ज्यादा बड़ी त्रासदी साबित हुई?

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June 15, 2020