इस आजादी के क्या मायने
इस आजादी के क्या मायने
डॉ. फारूक अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अगले कदम पर निर्भर होगी राज्य की राजनैतिक प्रक्रिया नसीर गनई

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला विशेषाधिकार । विहीन राज्य में आजाद कर दिए गए हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के बुजुर्ग नेता के खिलाफ सार्वजनिक सुरक्षा कानून (पीएसए) हटा दिया गया है। जम्मू-कश्मीर अब पूर्ण राज्य भी नहीं है। हालांकि रिहाई के बाद फारूक मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में “राज्य" ही कहते रहे। अनुच्छेद 370 के तहत अब कोई विशेष प्रावधान भी नहीं रहा, और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया है। नजरबंदी और उसके बाद पीएसए के तहत डॉ. अब्दुल्ला के करीब आठ महीने हिरासत में गुजरे। उन्होंने और कई अन्य नेताओं ने नजरबंदी के खिलाफ कोई अपील नहीं की। पिछले साल 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को बेमानी बनाने के बाद सैकड़ों नेताओं के साथ हिरासत में रहे एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "जब डॉ. अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया गया, मैं समझ गया कि सब कुछ खत्म हो गया है। भारत ने हमारी हैसियत बता दी है। जिंदगी और राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी।"

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुताबिक डॉ. अब्दुल्ला को रिहा करने के सिवा सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था, लेकिन वे रिहा होने के बाद राजनैतिक मुद्दों को लेकर बेहद सतर्क रहे। डॉ. अब्दुल्ला को नवगठित 'अपनी पार्टी' की घोषणा के फौरन बाद रिहा किया गया इसलिए आने वाले दिनों में राजनैतिक घटनाएं नया मोड़ ले सकती हैं। डॉ. अब्दुल्ला की रिहाई के एक दिन बाद अपनी पार्टी के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के विपरीत जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी (जेकेएपी) के लिए राज्य के पूर्व प्रधानमंत्री गुलाम मोहम्मद बख्शी रोल मॉडल हैं। जेकेएपी के नेता अल्ताफ बुखारी ने आउटलुक को बताया कि उन्होंने सात महीने इंतजार किया कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) आम जनता के ज्वलंत मुद्दे उठाने के लिए आगे आएंगी। बुखारी कहते हैं, "बदकिस्मती से वे आगे नहीं आए। नेताओं के गिरफ्तार होने से राजनैतिक पार्टियां खत्म नहीं हो जातीं। अब उनके ज्यादातर नेता रिहा हो चुके हैं। हमें लगता था कि वे मुद्दों पर बात करेंगे, लेकिन वे चुप रहे। हमें मुद्दे उठाना जरूरी लगता है।"

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April 06, 2020