भारतीय संस्कृति की विजय का पर्व
Open Eye News|August 2020
भारतीय संस्कृति की विजय का पर्व
यह सर्वसमावेशी, सभी आस्थाओं का सम्मान करने वाली, पद दलितों को अपनाने वाली, सभी का भला चाहने वाली संस्कृति की विजय का पर्व है।
राकेश सैन

पांच अगस्त का दिन है सरयू के मुहाने पर बाबरी बेड़े के दरकने का, संदेश है 'एकम् सद् विप्रबहुधा वदंति' के सनातन सिद्धांत की विजय का। एक बार सत्य फिर स्थापित हो रहा है कि न तो तलवार के जोर पर व न ही किसी और तरह से पूरी दुनिया को एक ही मजहब के रंग में रंगा जा सकता है। दुनिया में पहली मस्जिद बनाने वाले केरल नरेश चेरामन पेरुमल और उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाने वाले दारा शिकोह की भारत भूमि की साफगोई है कि यहां इस्लाम को लेकर कासिम-बाबर की खूनी-मतांध व्याख्या नहीं चलेगी। उपरोक्त शेर में मौलाना अल्ताफ हाली ने इसी आक्रांत विचारधारा की भारत में हुई पराजय का जिक्र करते हुए किसी समय कहा था कि अरब देश का वह दबंग बेड़ा जिसकी पताका पूरी दुनिया में फहराई। कोई भय जिसके मार्ग में नहीं आ सका। जो न बलूचिस्तान, मध्य अम्मान की खाड़ी में ठिठका और लाल सागर में भी नहीं झिझका। जिसने सातों समंदर अपनी तलवार के जोर पर अपने अधीन कर लिए, दीन-ए-हजाजी का वही बेड़ा गंगा के मुहाने पर आकर डूब गया। किसी समय यह गंगा में डूबा होगा, परन्तु आज सरयू जी के मुहाने में जलसमाधि लेता दिखाई दे रहा है।

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