राम मंदिर पर दुराग्रह का प्रदर्शन
Open Eye News|August 2020
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राम मंदिर पर दुराग्रह का प्रदर्शन
लगभग पांच शताब्दी की लंबी प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन समारोह संपन्न् हो गया।
संजय गुप्त

कोविड महामारी के बावजूद इस समारोह ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। स्वाभाविक रूप से एक बड़े वर्ग ने इस समारोह का स्वागत करते हुए राम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इसी के साथ खुद को वामपंथी, सेक्युलर और लिबरल कहने वालों ने इस दिन को भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात करने वाला दिन बताया। देश के सांस्कृतिक- धार्मिक मूल्यों से कटे हुए इन लोगों ने यह साबित करने की भी कोशिश की कि इतिहास पांच अगस्त को एक ऐसे दिन के रूप में याद रखेगा, जब बहुसंख्यकवाद को थोपने का काम किया गया।

ऐसे दुराग्रही लोगों की सोच बदलना मुश्किल है,क्योंकि उनकी सोच बहुत संकुचित है। इस सोच के मूल में है उनकी शिक्षा-दीक्षा। यह वर्ग पाश्चात्य संस्कृति से इतना अभिभूत है कि वह अपनी संस्कृति और उसकी मान्यताओं से परिचित ही नहीं होना चाहता। इसी कारण वह राम मंदिर की महत्ता को नहीं समझ रहा। राम मंदिर महज एक और मंदिर नहीं है। इसकी महत्ता एक तीर्थस्थल से बढ़कर है, क्योंकि यह राम के जन्म-स्थल पर निर्मित हो रहा है। इसकी महत्ता उतनी ही है, जितनी मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि मंदिर की। दुराग्रही वर्ग यह समझने को भी तैयार ही नहीं दिखता कि किसी देश की आत्मा उसकी अपनी संस्कृति में रची-बसी होती है और राम इस देश की संस्कृति में बहुत गहरे रचे-बसे हैं।

यह किसी से छिपा नहीं कि आजादी के बाद की शिक्षा व्यवस्था में वामपंथी हावी रहे और उन्होंने जान-बूझकर इतिहास को एकपक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया। गलत इतिहास के साथ ही उस विजातीय सेक्युलरिज्म ने भी ऐसे लोगों के चिंतन को दूषित किया, जो तुष्टीकरण का पर्याय बनकर रह गया है।

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