भारतीय राजनीति में 'सवालों' के 'जवाब' के 'उत्तर' में क्या सिर्फ 'सवाल' ही रह गए हैं?
Open Eye News|July 2020
भारतीय राजनीति में 'सवालों' के 'जवाब' के 'उत्तर' में क्या सिर्फ 'सवाल' ही रह गए हैं?
भारतीय राजनीति का एक स्वर्णिम युग रहा है। जब राजनीति के धूमकेतु डॉ राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी बाजपेई, बलराम मधोक, के. कामराज, भाई अशोक मेहता, आचार्य कृपलानी, जॉर्ज फर्नाडिस, हरकिशन सिंह सुरजीत, ई. नमबुरूदीपाद, मोरारजी भाई देसाई, ज्योति बसु, चंद्रशेखर, तारकेश्वरी सिन्हा जैसे अनेक हस्तियां रही है। ये और उनके समकक्ष अनेक नेता गण संसद मैं व बाहर इतने हाजिर जवाब होते थे, जब इनसे मीडिया या अपने विपक्षियों द्वारा कोई प्रश्न पूछा जाता था। तब उनका उत्तर सामने वाले से उल्टा प्रश्न करना नहीं होता था, जैसे कि आजकल यह एक परिपाटी ही बन गई है। बल्कि वे सटीक जवाब देकर सामने वाले को निरूतर कर आवश्यकतानुसार प्रति-प्रश्न करने में भी सक्षम होते थे व माहिर थे।
राजीव खंडेलवाल

आज की राजनीति में चूंकि उत्तर देने वाले के पास कोई सही उत्तर होता नहीं है, इसलिए वह दाये-बाये बगले झांकता हुआ, निरूतर दिखने की बजाए, उत्तर देने के प्रयास में सहूलियत अनुसार प्रश्नकर्ता पर ही दूसरा असंबंधित प्रश्न दाग देता है। फिर प्रश्न कता भी वापस उत्तर देने के बजाय पुनः प्रश्न कर बैठता है। इस प्रकार भारत की लोकतांत्रिक राजनीति सार्थक प्रश्नोत्तर की बहस के बदले मात्र "प्रश्नों" व प्रश्नों के प्रश्न पर जाकर अटक गई है। उत्तर कब मिलेगा? भोली भाली जनता कब तक उत्तर की प्रतीक्षा रत रहेगी? यह मालूम नहीं ऐसा लगता है जब तक जनता सिर्फ उत्तर देते रहेगी, और प्रश्न नहीं करेगी, तब तक राजनेतागण जनता को 'उत्तर' देने के लिये मजबूर करके, उनकी मजबूरी को ही अपना दायित्व पूर्ण हुआ मान कर, सिर्फ प्रश्न पूछते रहने को ही वे अपना कतव्य मानते रहेगें" और जनता से सिर्फ उत्तर देते रहने की अपेक्षा कर कहकर जनता को ही "उत्तरदायी" जरूर बनाते रहेगें। यह संविधान का मखौल नहीं तो क्या है? क्योंकि संविधान ने तो जनता को जन प्रतिनिधियों से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया है और उन प्रश्नों के समाधानकारक उत्तर देने का संवैधानिक दायित्व व कर्तव्य राजनेताओं का ही हैं।

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