कैसे मंडराए ड्रोन के झुंड
India Today Hindi|November 04, 2020
कैसे मंडराए ड्रोन के झुंड
हथियारबंद ड्रोन के मामले में पीछे सशस्त्र बलों ने आयात के जरिए इसकी भरपाई के लिए तेज कदम बढ़ाया, मगर कठिन सवाल यही है कि इस बेहद जरूरी प्लेटफॉर्म के स्वदेशी निर्माण का इंतजाम करना अनिवार्य
संदीप उन्नीथन

लदाख में चीन के साथ अब छठे महीने में चल रहे सैन्य गतिरोध का एक नतीजा यह हुआ है कि सशस्त्र बलों के लिए साजो-सामान जुटाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है. सेना की तीनों अंगों की जरूरतों और खरीद की फेहरिस्त में सबसे ऊपर है ड्रोन. फास्ट ट्रैक खरीद और, वर्षों नहीं, महीनों के भीतर डिलिवरी के जरिए जिस तरह तुरत-फुरत ये शस्त्र प्रणालियां हासिल की जा रही हैं, वह बताता है कि सैन्य बलों की ताकत बढ़ाने वाले इन यंत्रों की अहमियत कितनी बढ़ गई है.

सेना हाथो हाथ ढोए जा सकने वाले ऐसे जासूस ड्रोन की तलाश में है, जो उसके उत्तरी रणक्षेत्र की सामान्य से कम ऑक्सीजन वाली ऊंचाइयों पर काम कर सके. वह ज्यादा बड़े और सशस्त्र ड्रोन भी चाहती है जो बिल्कुल सटीक मिसाइलों से पाकिस्तानी सरहद के उस पार आतंकी शिविरों पर निशाना साध सके. नौसेना अपने युद्धपोतों से काम कर सकने वाली 10 यूएएस (स्वचालित हवाई प्रणालियां) हासिल करने के लिए एक फास्ट-ट्रैक अनुबंध यह वित्त वर्ष खत्म होने से पहले ही पूरा कर लेना चाहती है. सेना के तीनों अंगों को अपने पहले हथियारबंद ड्रोन छह एमक्यू-9बी गार्डियन ड्रोन की शक्ल में मिलेंगे, जो अमेरिका से बने-बनाए खरीदे गए हैं. यह सौदा 4,000 करोड़ रुपए का है, जिसमें अगले कुछ वर्षों के दौरान 18 और खरीदने का विकल्प है. अलबत्ता जो करार दस्तखत होने के करीब पहुंच गया है, वह सेना के तीनों अंगों के लिए मध्यम ऊंचाई के और लंबे वक्त तक टिकाऊ 'हेरॉन' ड्रोन को उन्नत बनाने के लिए 8,500 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट चीता है. रक्षा मंत्रालय इज्राएल एरोस्पेस इंडस्ट्रीज (आइएआइ) के साथ कीमत को लेकर मोल-भाव पूरा कर चुका है और यह मुख्य रूप से एक दशक पहले खरीदे गए आइएसआर (निगरानी और टोही) ड्रोन के बेड़े को हथियार प्लेटफॉर्म में बदलेगा. यह प्रोजेक्ट सेना को उपग्रह नौवहन, हवा से जमीन पर मिसाइल दागने और सटीक हथियारों से लैस करेगा और फिलहाल सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की मंजूरी का इंतजार कर रहा है (देखें आसमान में ड्रोन). इन प्रस्तावों के लिए तीनों सशस्त्र बल अगले कुछ वर्षों में कुल मिलाकर 36,000 करोड़ रुपए (5 अरब डॉलर) से ज्यादा खर्च करेंगे.

सशस्त्र और निरस्त्र दोनों तरह के ड्रोन का इस्तेमाल हाल के वर्षों में एशिया और अफ्रीका में बड़े युद्धों में हुआ है. सीरिया में आइएसआइएस ने हथगोले दागने के लिए छोटे ड्रोन का इस्तेमाल किया. लीबिया के गृह युद्ध में दोनों तरफ से युद्धक ड्रोन का इस्तेमाल किया गया. ड्रोन टेक्नोलॉजी को ज्यादा कारगर और अत्याधुनिक बनाने के उपक्रम भी हैं. 14 सितंबर, 2019 को सऊदी अरामको के तेल संयंत्रों पर कथित तौर पर यमन के हूसी बागियों के हमले से जाहिर हुआ कि आतंकी और बागी संगठन भी इसका आसानी से मारक इस्तेमाल कर सकते हैं. अजरबैजान और अर्मीनिया के बीच करीब दशक बाद पहले सशस्त्र टकराव में खुले हवाई क्षेत्र में ड्रोन की विनाशकारी क्षमता का प्रदर्शन हुआ है. अजरबैजान के तुर्की में बने सशस्त्र यूएएस के बेड़े ने टैंकों, ट्रकों और किलेबंदियों को नेस्तोनाबूद कर दिया. साफ है कि सशस्त्र ड्रोन आने वाले कल के किन्हीं सुदूर रणक्षेत्रों की नहीं, बल्कि आज ही सेना की ताकत कई गुना बढ़ाने वाले उपकरण हैं.

articleRead

You can read up to 3 premium stories before you subscribe to Magzter GOLD

Log in, if you are already a subscriber

GoldLogo

Get unlimited access to thousands of curated premium stories, newspapers and 5,000+ magazines

READ THE ENTIRE ISSUE

November 04, 2020