जीत की जोड़ी
India Today Hindi|November 04, 2020
जीत की जोड़ी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे की ताकत के साथ सत्ता विरोधी लहर से निबटकर नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के रूप में एक और मौका पा सकते हैं. लोकनीति-सीएसडीएस का जनमत सर्वेक्षण तो यही कहता है
अमिताभ श्रीवास्तव

कोविड की छाया तले भारत के पहले बड़े चुनाव का प्रचार अभियान बिहार में जब धूमधाम से आरंभ हुआ और शुरुआत में उम्मीदवारों ने मतदाताओं तक पहुंचने के लिए गैर-पारंपरिक तरीके अपनाए थे. उन्होंने ई-रैलियां की, राजनैतिक संदेशों का तूफान बरपाने के लिए सोशल नेटवर्किंग साइटों को सजाया-संवारा. लेकिन जल्द ही राजनैतिक दलों को समझ में आ गया कि मतदाताओं को रिझाने के लिए पारंपरिक तौर-तरीकों से ज्यादा असरदार और कुछ नहीं है. इनमें सबसे अव्वल आमने-सामने जनसभाओं को संबोधित करना और भारी तादाद में भीड़ जुटाना है, फिर भले ही सामाजिक दूरी के नियम-कायदों और मास्क पहनने सरीखी सावधानियों को नजरअंदाज ही क्यों न करना पड़े. देश को संक्रमणों की दूसरी लहर के खतरों से आगाह करने के बावजूद खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 12 धमाकेदार चुनावी रैलियों को संबोधित करने जा रहे हैं, जो 23 अक्तूबर से शुरू होंगी. जाहिर है वे पक्का करना चाहेंगे कि राज्य में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की हुकूमत कायम रहे.

बड़ी राजनैतिक पार्टियों ने अपने गठबंधन के भागीदार चुनने में पारंपरिक अक्लमंदी का सहारा लेना चुना. दिसंबर 2000 में जब बिहार से काटकर झारखंड बनाया गया था, तभी से दोनों ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों जनता दल (यूनाइटेड) या जद (यू) और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने विधानसभा का एक भी चुनाव अकेले अपने दम पर नहीं जीता. मसलन, 2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्हें बहुमत जुटाने के लिए एनडीए के छाते के नीचे भाजपा के साथ आना पड़ा. 2009 के लोकसभा और 2010 के विधानसभा चुनाव में भी वे एनडीए के साथ रहे और अच्छी फतह हासिल की जबकि राजद ने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा और धूल चाटी. लेकिन 2015 आते-आते नीतीश ने एनडीए को धता बता दी और राजद के साथ हाथ मिला लिए, जिसकी अगुआई उस वक्त उनके प्रतिद्वंद्वी लालू प्रसाद यादव कर रहे थे. इस महागठबंधन ने मोदी का विजय रथ बीच में रोक दिया और जद (यू)-राजद धूमधाम से सत्ता में आ गए. दो साल बाद, 2017 में नीतीश के लालू से रिश्ते टूट गए और उन्होंने महागठबंधन को धता बताकर भाजपा के समर्थन से गठबंधन सरकार बनाने का फैसला किया.

अब 2020 में विधानसभा चुनाव में बड़ी पार्टियों का बहुत कुछ दांव पर है और उन्होंने अकेले चुनाव में उतारने के बजाए गठबंधनों के साथ काम करने को तरजीह दी है. बीते 15 सालों से हुकूमत करते आ रहे और लगातार चौथी जीत (तकनीकी तौर पर छठे कार्यकाल) के लिए चुनाव में उतरे नीतीश ने तय किया कि भाजपा के साथ टिके रहना ही जद (यू) के लिए सबसे अच्छा होगा. भाजपा ने नीतीश के खिलाफ सत्ताविरोधी भावनाओं के बढ़ते ज्वार को लेकर अपने कार्यकर्ताओं की चिंताओं को दरकिनार कर दिया और गठबंधन में ही चुनाव लड़ने का फैसला किया.

भाजपा ने ऐसा इसलिए भी किया क्योंकि उसे अच्छी तरह पता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में जोरदार प्रदर्शन के बावजूद वह राज्य में अब भी अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकती. यही नहीं, बिहार में जीत इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि चुनाव का नतीजा कोविड संकट से मोदी सरकार के निपटने पर एक किस्म का जनमत संग्रह होगा. इन नतीजों का असर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत उन अहम राज्यों में भी भाजपा की संभावनाओं पर पड़ेगा जहां 2021 में चुनाव होने वाले हैं.

विपक्षी पार्टियों ने भी निर्णायक गठबंधन कायम करने की ताकत को समझ लिया है. राजद ने अकेले चुनाव लड़ने के बजाए महागठबंधन (एमजीबी) के बैनर तले कांग्रेस के साथ बने रहने का फैसला किया, बावजूद इसके कि बिहार में ग्रैंड ओल्ड पार्टी का चुनावी रिकॉर्ड मायूस करने वाला है. वामपंथी पार्टियों को तो वह अपने साथ लाने में कामयाब रही, लेकिन कई छोटी-छोटी पार्टियों को साथ जोड़े नहीं रख सकी, जिनमें से दो का एनडीए ने खुशी-खुशी स्वागत किया. ये दोनों पार्टियां हैं जीतन राम मांझी का हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) या एचएएम (एस) और मुकेश सहनी की विकासशील इनसान पार्टी (वीआइपी).

इस चुनाव का नतीजा महागठबंधन के घटक दलों के लिए भी कम अहम नहीं होगा. जहां तक राजद की बात है, लालू प्रसाद यादव चूंकि जेल में सजा काट रहे हैं, लिहाजा पार्टी को नए सिरे से एकजुट करके जुझारू ताकत बनाने और राज्य की राजनीति में प्रासंगिकता फिर हासिल करने की सारी जिम्मेदारी क्रिकेटर से राजनेता बने उनके छोटे बेटे तेजस्वी के कंधों पर आ गई है. कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद, यह हिंदी पट्टी में फिर कुछ कर दिखाने और यह साबित करने का मौका है कि वह अकेली राष्ट्रीय पार्टी है जो अब भी भाजपा का मुकाबला कर सकती है.

तेजस्वी ने मुसलमान वोट बिखरने से रोकने को भले कांग्रेस को 10 सीटें दे दी हों लेकिन इस पार्टी में ज्यादा दम न होने से उन्हें बाद में पछताना पड़ सकता है

मतदाताओं का मिजाज भांपने के लिए लोकनीति-सीएसडीएस ने मिलकर 10 से 17 अक्तूबर के बीच व्यापक जनमत सर्वेक्षण किया, जिसके एक्सक्लूसिव अधिकार इंडिया टुडे ने हासिल किए हैं. सर्वे के नतीजे बताते हैं कि हालांकि एनडीए की वोट हिस्सेदारी 2019 के लोकसभा चुनाव के प्रभावशाली 46.3 फीसद से घटकर 38 फीसद पर आ सकती है, फिर भी वह महागठबंधन से छह फीसद अंक आगे है. जहां तक सीटों की बात है, एनडीए 133-143 सीटों के अनुमान के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल कर लेगा. (बिहार में 243 विधानसभा सीटें हैं और पार्टी को स्पष्ट बहुमत के लिए 122 सीटें चाहिए.) एमजीबी के 88-98 सीटें जीतने का अनुमान है जबकि चिराग पासवान की अगुआई में चुनाव से डेढ़ महीने पहले एनडीए छोड़कर अकेले चुनाव में उतरने का फैसला करने वाली लोजपा को महज छह सीटें मिलने का अनुमान है. हालांकि लोकनीति-सीएसडीएस ने चेताया भी है-करीब 14 फीसद उत्तरदाताओं ने कहा कि वे आने वाले हफ्तों में अपनी वोटिंग पसंद बदल भी सकते हैं और अन्य 10 फीसद ने अपनी पसंद का खुलासा नहीं करना चुना. इसका मतलब है कि हर चार में से एक वोटर ने अभी पक्का फैसला नहीं किया है और ये आने वाले हफ्तों में निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं.

सर्वे का एक और बड़ा नतीजा यह है कि नीतीश कुमार 31 फीसद उत्तरदाताओं के वोट के साथ मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय पसंद बने हुए हैं, वहीं तेजस्वी 27 फीसद के साथ दूसरे नंबर पर उनके करीब आ गए हैं. मुख्यमंत्री के लिए चिंता की बात यह है कि उनके कामकाज से संतुष्ट लोगों की संख्या 2015 के 80 फीसद से घटकर अब 52 फीसद पर आ गई है. इसके उलट, उनके कामकाज से असंतुष्ट लोगों की संख्या 18 फीसद से बढ़कर इस चुनाव में 44 फीसद पर पहुंच गई है और 43 फीसद उत्तरदाताओं ने यह भी कहा कि वे उन्हें एक और कार्यकाल देने के विरुद्ध हैं जबकि इसके मुकाबले उन्हें मुख्यमंत्री के पद पर लौटते देखना चाहने वालों की तादाद 38 फीसद है. ये सत्ताविरोधी मिजाज के साफ संकेत हैं. असंतोष के बढ़ते ज्वार को जो बात बेअसर करती जान पड़ती है, वह यह है कि मतदाताओं का स्पष्ट बहुमत केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार से संतुष्ट हैं. सर्वे से खुलासा होता है कि ज्यादा संभावना यही है कि एनडीए के वोटर नीतीश सरकार के कामकाज के बजाए मोदी सरकार के कामकाज के आधार पर अपना वोट देंगे. हमारे सर्वे का नतीजा यह है कि नीतीश को अगर फिर चुनकर आना है तो नरेंद्र मोदी और भाजपा उनके लिए बेहद अहम होंगे. बहुत कुछ दोनों गठबंधनों की आगामी सप्ताहों में प्रचार की रणनीति पर निर्भर होगा. बिहार में तीन चरणों में मतदान 28 अक्तूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को होगा जबकि 10 नवंबर को नतीजे आएंगे.

नीतीशः विकास ही कुंजी है

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