सीमांकन पर मची रार
India Today Hindi|August 12, 2020
सीमांकन पर मची रार
असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मणिपुर, पूर्वोत्तर के इन राज्यों के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में परिसीमन अभ्यास शुरू करने के केंद्र सरकार के हालिया फैसले पर विपक्ष और नागरिक समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. अगले साल असम में विधानसभा चुनाव होने हैं और विपक्षी दल इसे चुनाव से पहले के सियासी हथकंडे के रूप में देख रहे हैं. इस कदम की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठ रहा है.
कौशिक डेका

तकनीकी रूप परिसीमन किसी आबादी की संरचना में आए बदलाव को लोकसभा और विधानसभा में उचित प्रतिनिधित्व के लिए जनसांख्किीय पुनर्गठन का अभ्यास है. इसमें लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से परिभाषित किया जाता है. पर विपक्ष इसके संभावित सियासी नतीजों को लेकर परेशान है. यह अभ्यास अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या के पुनर्विचार की बात भी करता है. सिद्धांत रूप में इसका उद्देश्य सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करना है.

भारत में पूर्व में चार बार यह अभ्यास हो चुका है. नवीनतम अभ्यास (2002-2008) में, ऊपर वर्णित चार पूर्वोत्तर राज्यों को बाहर रखा गया था क्योंकि परिसीमन के आधार के रूप में 2001 की जनगणना का उपयोग किया जा रहा था और इसको लेकर गुवाहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी. चुनौती का तर्क यह था कि इन राज्यों की जनगणना 2001 के आंकड़ों में छेड़छाड़ की गई थी. इन चार राज्यों में परिसीमन अभ्यास को स्थगित करने के लिए राष्ट्रपति को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 14 जनवरी, 2008 को परिसीमन अधिनियम 2002 में संशोधन किया गया था.

इस साल 28 फरवरी को, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 2008 के स्थगन आदेश को रद्द कर दिया, जिससे इन चार राज्यों में परिसीमन अभ्यास के लिए रास्ता साफ हो गया. 6 मार्च को, केंद्रीय कानून मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में परिसीमन आयोग के गठन की घोषणा की थी. चुनाव आयोग के एक पूर्व कानूनी सलाहकार एस.के. मेंदिरत्ता, जिन्होंने आयोग को 50 से अधिक वर्षों तक कानूनी सलाह दी है, ने जून में तीन चुनाव आयुक्तों को लिखकर कहा कि परिसीमन आयोग के गठन की घोषणा वाली कानून मंत्रालय की अधिसूचना, जन प्रतिनिधित्व कानून (आरपीए), 1950 का उल्लंघन है.

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August 12, 2020