हिमालय में अशांति

India Today Hindi|June 17, 2020

हिमालय में अशांति
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी की घुसपैठ से देश के नवीनतम केंद्रशासित प्रदेश की नाजुक स्थिति की नई कसौटी उजागर हुई
संदीप उन्नीथन

कुछ साल पहले सेना की उत्तरी कमान के आला अफसरों ने युद्ध अभ्यास में बदलाव लाने का फैसला किया. उधमपुर स्थित यह कमान जम्मू के मैदानों से लेकर उत्तराखंड की सरहद के पास दुर्गम बर्फीले रेगिस्तान तक फैले घोड़े की नाल सरीखे 2,000 किमी लंबे भूभाग की रखवाली करती है. तब पाकिस्तान के साथ युद्ध की संभावना की पड़ताल चल रही थी. उस साल इस समीकरण में चीन को भी शामिल करने का फैसला किया. यानी अगर दो देशों से एक साथ जंग लड़ना पड़े तो क्या होगा? युद्ध अभ्यास किया गया, जिसमें चीन पहले दो दिन आक्रामक रहा और उसके साथ पाकिस्तान भी आ मिला. नतीजे चिंताजनक थे. एक योजनाकार बुझे स्वर में कहते हैं कि वायु सेना की मदद से भी सेना के लिए निपट पाना बेहद मुश्किल होगा. कुछ साल पहले मीडिया के साथ अनाधिकारिक बातचीत में मौजूदा सुरक्षा प्रतिष्ठान के एक बड़े सदस्य ने दो मोर्चों पर जंग के परिदृश्य को 'असंभव' कहकर खारिज कर दिया क्योंकि इसमें भारत के कूटनीतिक वजन और कौशल पर गौर नहीं किया गया है, जो कम अहम नहीं है.

युद्ध अभ्यास निश्चित नहीं होते-उनमें अक्सर बदतरीन परिदृश्य रचे जाते हैं और जमीन पर लड़ने वाले कमांडरों के सामने बेहद सख्त और मुश्किल हकीकतों के नजारे पेश किए जाते हैं. ऐसी ही एक हकीकत इन दिनों उस भूभाग में खुल गई है जिसे सरकार 'पश्चिमी क्षेत्र' कहती है, यानी नए निर्मित केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख का पूर्वी किनारा. यहां भारतीय सेना चीन की पीएलए (पीपल्स लिबरेशन आर्मी) के खिलाफ आमने-सामने डटी है. पीएलए ने इस साल मई में दशकों की अपनी सबसे पक्की घुसपैठों में से एक को अंजाम दिया है. पूर्वी लद्दाख में 800 किमी लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तीन जगहों पर घुसपैठ हाल के वर्षों में सबसे बड़ी है. एलएसी के इर्दगिर्द विभिन्न जगहों पर डेरा डालकर बैठे चीनी सैनिकों की संख्या एक हजार से ज्यादा हो सकती है और उनके पीछे फौजी दस्ते, बख्तरबंद और तोपखाने भी हो सकते हैं. उतनी ही तादाद में भारतीय सैनिक भी आमने-सामने डटे हुए हैं, जैसा गलवां नदी घाटी और पैंगोंग त्सो पर टकराव के मोबाइल वीडियो में देखा गया, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2 जून को एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि पीएलए 'अच्छी-खासी तादाद' में आ घुसी है, लेकिन टकराव खत्म करने के लिए बातचीत चल रही है. लद्दाख में भारतीय सीमा बिंदु चुशुल-मोल्दो में दोनों सेना के लेफ्टिनेंट जनरलों के बीच 6 जून की बैठक में यथास्थिति बहाल होने की उम्मीद है. दोनों तरफ के कोर कमांडरों की यह पहली बैठक है. सेना के अफसरों का कहना है कि पीएलए के 5 मई से पहले की स्थिति में वापस जाने से कम किसी बात पर सुलह नहीं होगी.

अधिकारियों का कहना है कि बैठक सीमा बिंदु के चीन वाले हिस्से में होगी, क्योंकि यह पीएलए ने बुलाई थी. टकराव कम करने में दो और चीजों ने बड़ी भूमिका अदा की. वे थीं: दोनों देशों के बीच मध्यस्थता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की 27 मई की पेशकश-जिसे भारत ने नामंजूर कर दिया और अमेरिकी विदेशी मंत्री माइक पॉम्पियो का 2 जून का अहम बयान, जिसमें उन्होंने कहा कि 'चीन एलएसी के ईर्दगिर्द अपनी फौजों को आगे ले आया है.'

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