महामारी को मार भगाने की रणनीति
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महामारी को मार भगाने की रणनीति
देश में कोविड-19 के बड़े पैमाने पर सामुदायिक फैलाव की आशंका के मद्देनजर सरकार को स्वास्थ्य सुविधाओं के ढांचे की कमियां दूर करने और सटीक तौर-तरीके अपनाने के लिए तेज कदम बढ़ाने की जरूरत
सोनाली अचार्जी और अमरनाथ के. मेनन

1 सामुदायिक फैलाव की रोकथाम महामारी नोवल कोरोना वायरस से ग्रस्त लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. देश भर से स्थानीय तौर पर संक्रमण फैलने की रिपोर्ट आने लगी हैं. मतलब यह कि देश में कोविङ-19 तीसरे चरण के कगार पर है.

24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समूचे देश में एहतियातन तीन हफ्ते के लॉकडाउन (तालाबंदी) और स्वास्थ्य सुविधाओं के ढांचे को दुरुस्त करने के लिए 15,000 करोड़ रु. के प्रावधान का ऐलान किया. यह रकम अस्पतालों में अतिरिक्त बिस्तर की व्यवस्था, कोविड-19 की जांच के लिए किट तैयार करने और चिकित्सकों के प्रशिक्षण पर खर्च की जाएगी.

केंद्र नियम-कायदों के तय मानक तैयार कर रहा है और विशेष आइसोलेशन वार्ड वगैरह में सुरक्षा के लिहाज से जरूरी पहनावे तथा मेडिकल उपकरणों को हासिल करने की व्यवस्था कर रहा है. पहली पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण के नियम-कायदे भी तैयार किए जा रहे हैं.

नीति आयोग के सदस्य तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वी.के. पॉल कहते हैं, “घोषित रकम तो शुरुआत भर है. हमें ज्यादा की जरूरत होगी और यह इस पर निर्भर करेगा कि कितनी जल्दी हम इस महामारी से छुटकारा पा लेते हैं. इसके पहले राज्य सिर्फ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के फंड ही इस्तेमाल करते थे. अब उनकी पहुंच एक केंद्रीय फंड तक है. इस फंड को सबसे पहले

अस्पतालों में निजी सुरक्षा पहनावे, वेंटिलेटर, अतिरिक्त ऑक्सीजन, दवाइयां और प्रशिक्षित स्टाफ हासिल करने के लिए खर्च किया जाना चाहिए. आइसोलेशन वार्ड तो बनाए गए हैं लेकिन डॉ. पॉल का कहना है कि कोविङ-19 के तीसरे चरण को ध्यान में रखकर विशेष सुविधाओं का इंतजाम करना होगा. वे कहते हैं, जेनेवा में आइसीयू बिस्तर कम पड़ गए हैं. बीमारी इस कदर भयानक रूप ले चुकी है. हमें अच्छे अस्पतालों की जरूरत है. अब उसी पर फोकस है. अस्पतालों की मदद के लिए हमारे पास आइसोलेशन केंद्र, पक्की निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए और हमें मेडिकल कॉलेजों में कॉल सेंटर बनाने पर भी विचार करना चाहिए. डॉ. पॉल का मानना है कि भारत में अभी चरण 2 (एक से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण) ही है लेकिन अब परीक्षण का दायरा ज्यादा व्यापक हो गया है.

केरल इस तैयारी में बाकी राज्यों से दो कदम आगे है क्योंकि वहां स्वास्थ्य सुविधाओं की व्यवस्था भी अधिक चाक-चौबंद है और पंचायती राज संस्थाओं का तंत्र भी मजबूत है. मुख्यमंत्री पिनराई विजयन कहते हैं कि बड़ी तादाद में लोगों को क्वारेंटीन या अलग- थलग रखने की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए स्थानीय निकायों को इसके लिए अस्पतालों, मकानों, स्कूल और ऑडिटोरियम वगैरह की पहचान करने को कहा गया है. 19 मार्च को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए स्थानीय निकायों के पदाधिकारियों से बातचीत के दौरान विजयन ने चेताया, छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है. अगर मामले तेजी से बढ़े तो मौजूदा स्वास्थ्य तंत्र नाकाफी पड़ जाएगा. बड़ी संख्या में निगरानी वाले लोग घरों में ही अलग-थलग हैं. केरल की रणनीति यह है कि स्थानीय निकाय स्थानीय समुदायों की जिम्मेदारी लें और यह भी व्यवस्था करें कि स्थिति नियंत्रण में रहे और सामान की कमी आड़े न आए.

2 सिर्फ कोविड-19 का इलाज वाले अस्पताल और आइसीयू भारत में अस्पताल के बिस्तरों और आबादी का अनुपात 1:1,000 है या कुल दस लाख बिस्तर अस्पतालों में हैं. आइसीयू के बिस्तर तो 1,00,000 से भी कम हैं और वेंटिलेटर तो महज 40,000 ही हैं. लिहाजा, कोविड-19 के मामलों में तेज उछाल को झेलने में देश का स्वास्थ्य तंत्र सक्षम नहीं है. वेंटिलेटरों की तो सख्त जरूरत है. भारतीय चिकित्सा शोध परिषद (आइसीएमआर) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोविड-19 के करीब 5 प्रतिशत मरीजों को आइसीयू में भर्ती कराने की जरूरत पड़ सकती है और उनमें आधे को वेंटिलेटर की दरकार होगी.

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April 08, 2020