बचे रहने का अर्थशास्त्रत
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बचे रहने का अर्थशास्त्रत
कोरोना वायरस महामारी से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने तीन हफ्तों के लिए देशव्यापी तालाबंदी कर दी. इसकी सबसे ज्यादा मार यात्रा और पर्यटन, विमानन, हॉस्पिटैलिटी और मनोरंजन उद्योग पर पड़ेगी.
श्वेता पुंज और एम.जी. अरुण, साथ में अनिलेश एस. महाजन

पहले से मुश्किल में फंसे ऑटोमोबाइल सरीखे कुछ क्षेत्र और भी चरमरा जाएंगे. असंगठित क्षेत्र में अस्थायी श्रमिक के तौर पर या स्व-रोजगार करने वाले 30 करोड़ लोग आने वाले दिनों में रोजगार से जुड़ी चुनौतियों से दो-चार होंगे. शेयर बाजार भी बड़ी गिरावट के साक्षी बने. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 मार्च को कहा था कि सरकार ने अर्थव्यवस्था की मुश्किलों की थाह लेने और वित्तीय पैकेज सुझाने के लिए कार्यबल का गठन किया है, पर वक्त तेजी से गुजरता जा रहा है.

26 मार्च को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकट की घड़ी में गरीबों की मदद करने के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत उन लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी जो तीन हफ्तों की बंदी से प्रभावित हुए हैं. इसके लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके अलावा राहत पैकेज में कोरोना से लड़ने में मदद करने वाले हर कर्मचारी को 50 लाख रुपए का बीमा दिया जाएगा. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत अगले तीन महीने तक अतिरिक्त पांच किलो चावल और एक किलो दाल का मुफ्त वितरण किया जाएगा. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के 8.69 करोड़ लाभार्थी किसानों के खाते में अप्रैल के पहले हफ्ते में 2,000 रुपए की पहली किस्त डाली जाएगी.

मनरेगा में दैनिक मजदूरी 182 रुपए से बढ़ाकर 202 रुपए की गई. इससे पांच करोड़ परिवारों को फायदा होगा और हर कर्मचारी को 2,000 रुपए अतिरिक्त मिलेंगे. अगले तीन महीने बुजुर्गों को 1,000 रुपए प्रति माह और 20 करोड़ महिला लाभार्थियों को 500 रुपए प्रति माह की अनुग्रह राशि दी जाएगी. ये उपाय सरकार की ओर से 24 मार्च को दी गई रियायतों के बाद किए गए हैं जिनमें वित्त वर्ष 2018-19 के लिए देरी से दाखिल किए जाने वाले आयकर रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख 31 मार्च से बढ़ाकर 30 जून 2020 कर दी. इसी तरह इस साल मार्च, अप्रैल और मई के माल और सेवा कर रिटर्न दाखिल करने की आखिरी तारीख बढ़ाकर 30 जून कर दी. अन्य कदमों में शामिल हैं: बैंक खातों में न्यूनतम धनराशि रखने की बाध्यता को तीन महीनों के लिए हटाया गया और एटीएम से कितनी भी बार धन निकालने पर अगले तीन महीनों तक कोई शुल्क नहीं लगेगा.

सरकार कैसे इस राहत पैकेज के लिए पैसे की व्यवस्था करेगी? एक विकल्प तो यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) सरकारी बॉन्ड खरीदे-राजकोषीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन कानून की राष्ट्रीय आपदा धारा आरबीआइ को इसका अधिकार देती है. सरकार के पास एक विकल्प यह भी है कि वह हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट की वजह से हाथ आई बड़ी धनराशि का इस्तेमाल करे. सरकार उधार लेने पर भी विचार कर सकती है. एक और तरीका खर्चों में कटौती करने का है. मुंबई के एक निवेशक का अनुमान है कि सरकार के वेतन के मद में पिछले पांच साल में 140 अरब डॉलर (10.6 लाख करोड़ रुपए) का इजाफा हुआ है. वे कहते हैं, अगर सरकारी तनख्वाहो में 10 फीसद तक की कटौती कर दी जाए, तो तेल के दाम में आई गिरावट के फायदे के साथ इससे जीडीपी के करीब दो फीसद का फायदा मिल जाता है.

आरबीआइ परिसंपत्ति-वसूली यानी बेकार पड़ी परिसंपत्तियों के प्रभावी इस्तेमाल से अधिकतम संसाधन जुटाने के कार्यक्रम पर भी विचार कर सकता है, जो दूसरे वित्तीय संकटों के बाद अन्य देशों में चलाए गए कार्यक्रम से मिलता-जुलता हो सकता है. अमेरिका में ऐसा ही ट्रबल्ड एसेट रिलीफ प्रोग्राम चलाया गया था, जिसमें वित्तीय संस्थाओं की बैलेंस शीट को महफूज रखने के लिए उनकी टॉक्सिक परिसंपत्तियों यानी मांग के ध्वस्त हो जाने की वजह से बेकार हो चुके निवेशों को खरीद लिया था. इससे 2007-08 के सबप्राइम वित्तीय संकट से निपटने के लिए खर्च की गई अमेरिकी सरकार की लागत निकल आई थी. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक सदस्य कहते हैं, मगर इन उपायों में गहरा भरोसा होना चाहिए. इनका नतीजा घाटों में हो सकता है, जिससे और दिक्कत होगी, क्योंकि देश के राजनैतिक वर्ग के लिए इन घाटों को स्वीकार करने की सर्वानुमति बना पाना मुश्किल होगा.

भारतीय उद्योग जगत अपने लिए जो मिल चुका है, उससे कहीं ज्यादा की उम्मीद कर रहा है. अर्थव्यवस्था के तकरीबन हरेक क्षेत्र की कंपनियां सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं. कुछ को अनुदान सहायता की उम्मीद है, तो कुछ दूसरी कंपनियां सस्ते कर्ज, करों में कटौती या कर भुगतान के टलने की उम्मीद लगाई हैं. वे बैंकों के लिए तय भुगतान की शर्तों में लचीलापन भी चाहती हैं. कुल मिलाकर वे यहां नीचे दिए गए उपायों की उम्मीद कर रही हैं.

1 व्यवसायों के लिए राहत पैकेज लाएं

26 मार्च को किए गए कल्याणकारी ऐलानों के अलावा कुछ लोगों का अनुमान है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को जीडीपी के करीब 1 फीसद या करीब 2 लाख करोड़ रुपए के वित्तीय पैकेज की जरूरत है. साथ ही आपसी तालमेल के साथ राजकोषीय और मौद्रिक नीति से जुड़े उपाय करना जरूरी है. अभी तक कोई नीतिगत उपाय नहीं किए गए हैं लेकिन अब जब देशव्यापी लॉकडाउन है, अर्थव्यवस्था को उबारने की योजना की जरूरत है. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) का कहना है कि वित्तीय पैकेज संकट से उबरने में उद्योग जगत की मदद करेगा और साथ ही उपभोक्ता मांग को तेजी से बढ़ाएगा. यह भी सुझाव दिया गया है कि 10 फीसद के दीर्घावधि पूंजीगत लाभ कर को हटा दिया जाए और कुल लाभांश कर 25 फीसद तय कर दिया जाए.

2 कारोबार के लिए सस्ती मिले पूंजी

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April 08, 2020