महाराज की बगावत
महाराज की बगावत
कांग्रेस के पुराने दिग्गज ग्वालियर रजवाड़े के वारिस की महत्वाकांक्षाओं के आड़े आए तो नए भविष्य की तलाश में भाजपा की ओर रुख किया कौशिक डेका, राहुल नरोन्हा और उदय माहूरकर
रोहित परिहार

अपने पिता दिवंगत माधवराव सिंधिया की 10 मार्च को 75वीं जयंती पर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम एक पत्र ट्विटर पर पोस्ट किया, जिसमें पार्टी में 18 साल के अपने रिश्ते से इस्तीफा था. मध्य प्रदेश में प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) प्रमुख के पद से वंचित रहने और राज्यसभा सीट का कोई आश्वासन न मिलने के कारण उपजी हताशा सिंधिया के भाजपा की ओर रुख करने के तात्कालिक कारण हो सकते हैं. लेकिन ग्वालियर के महाराज का कांग्रेस के साथ मोहभंग 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद ही शुरू हो गया था.

सूत्रों के मुताबिक, सिंधिया खुद को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाना या प्रदेश प्रमुख का पद चाहते थे लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व-तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी और उसके बाद उनकी मां सोनिया ने इसमें रुचि नहीं दिखाई. चुनाव से छह महीने पहले, कांग्रेस ने कमलनाथ को मध्य प्रदेश में पार्टी प्रमुख बनाया जिनके सिंधिया के साथ रिश्ते बहुत ठंडे रहे हैं. सांत्वना के रूप में सिंधिया को पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया जिससे उनके मुख्यमंत्री पद की रेस में होने की उम्मीद बनी रही. नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक राज्यसभा सांसद कहते हैं, "विधानसभा चुनाव से पहले नए प्रदेश प्रमुख की बात आई तो सिंधिया उस चुनौती को लेने के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें लग रहा था कि चुनाव की तैयारियों में देर हो चुकी है. कमलनाथ ने चुनौती स्वीकार की और पुरस्कृत किए गए."

दरकिनार, उपेक्षित

सिंधिया के लिए, कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने का राहुल का फैसला एक झटका था. उन्होंने खुद को ठगा हुआ महसूस किया क्योंकि वे हमेशा राहुल के साथ खड़े रहे और उनके ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में कांग्रेस की जबरदस्त सफलता ने 15 साल बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की 34 सीटों में से कांग्रेस ने 26 जीतीं. ऐसा भी नहीं है कि सिंधिया को इसके पुरस्कारों से पूरी तरह वंचित रखा गया था. कांग्रेस के 114 विधायकों में से 25 विधायक सिंधिया खेमे के हैं. इसके मद्देनजर कमलनाथ ने मंत्रिमंडल में सिंधिया के आठ वफादारों को शामिल किया. उन्हें ग्वालियर और चंबल में प्रशासनिक मामलों में पूरी आजादी दी गई. अधिकारियों का दावा है कि दोनों क्षेत्रों के लगभग सभी जिलों के कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को सिंधिया की इच्छा के अनुसार बदल दिया गया था.

लेकिन सिंधिया इतने भर से खुश नहीं थे. उनके सहयोगियों का कहना है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में उनके नेता को राज्य कांग्रेस में दरकिनार कर दिया गया था. सिंधिया के कई वफादारों का दावा है कि उन्हें मंत्री पद से वंचित रखा गया और मंत्रिमंडल में शामिल कुछ भाग्यशाली लोगों को सरकार के भीतर प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था. सिंधिया को लग रहा था कि न केवल उनके अपने निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित अनुरोधों को पार्टी लगातार नजरअंदाज कर रही है, बल्कि उन्हें इस बात का भी खतरा दिख रहा था कि मंत्री बनने से वंचित रह गए उनके अपने कुछ वफादार कमलनाथ खेमे में जा सकते हैं. कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह ने कथित तौर पर सिंधिया के खिलाफ कमलनाथ के साथ हाथ मिला लिया. इससे तनाव और बढ़ गया. सिंधिया के एक करीबी सहयोगी का दावा है, "दोनों नेताओं ने पार्टी के भीतर और जनता के बीच, सिंधिया की हैसियत कम करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और कांग्रेस आलाकमान आंखें मूंदे रहा."

हालांकि, कांग्रेस कार्यसमिति के एक सदस्य मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सिंधिया की आकांक्षाओं को "गैर-वाजिब महत्वाकांक्षा" बताकर खारिज करते हैं. वे कहते हैं, "114 कांग्रेस विधायकों में से सिर्फ आठ सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जबकि 96 कमलनाथ के पक्ष में थे. आलाकमान निर्वाचित विधायकों की इच्छाओं की अनदेखी कैसे कर सकता था?"

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेतृत्व ने सिंधिया को पश्चिम उत्तर प्रदेश का । प्रभारी महासचिव बनाकर उनकी नाराजगी कम करने का प्रयास किया. प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था. हालांकि, दोनों नेता कोई कमाल नहीं कर सके और कांग्रेस के खाते में एकमात्र सीट रायबरेली (सोनिया गांधी) ही आई.

सिंधिया खेमे का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी जिम्मेदारी संभालना उनके लिए महंगा साबित हुआ क्योंकि वे मध्य प्रदेश में अपनी लोकसभा सीट गुना करीब 1,25,000 वोटों से हार गए. यह हार इसलिए भी अधिक दर्दनाक रही क्योंकि सिंधिया भाजपा के जिस कृष्णपाल सिंह यादव के हाथों पराजित हुए वे कभी सिंधिया के ही सहयोगी हुआ करते थे और उनका खास राजनैतिक वजूद भी नहीं था.

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March 25, 2020