असम आंदोलन की देन हैं एनआरसी

Gambhir Samachar|March 16, 2020

असम आंदोलन की देन हैं एनआरसी
1983 में राज्य में नए सिरे से चुनावों की घोषणा हुई. असम आंदोलन चला रहे सभी दलों ने इस चुनाव के बहिष्कार का ऐलान किया. वो चाहते थे कि सरकार पहले घुसपैठियों के नाम वोटर लिस्ट से निकाले, लेकिन सरकार नहीं मानी, तो चुनाव के दौरान जमकर हिंसा हुई. असम में इस तरह की राय बन गई थी कि बांग्लादेशियों ने चुनाव बहिष्कार के ऐलान के बावजूद जमकर वोटिंग की है. नतीजे में हुआ एक बड़ा नरसंहार.
श्रीराजेश

ऑल असम गण संग्राम परिषद असम के दूसरे कई संगठनों जिसमें असम साहित्य सभा, असम कर्मचारी परिषद, असम जातिवादी युवा छात्र परिषद, असम युवक समाज, असम केंद्रीय कर्मचारी संगठन और कुछ छोटी पार्टियां जैसे असोम जातियावादी दल और पूर्वांचल लोक परिषद से मिलकर बनी थी. इन दोनों की खास बात यह थी कि दोनों का ही नेतृत्व युवा कर रहे थे. आसू के लीडर प्रफुल्ल कुमार महंता थे तो गण परिषद का नेतृत्व बिरज कुमार शर्मा कर रहे थे. दोनों ने मांग की कि 1961 के बाद असम में आए बांग्लादेशी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाएं और इनको यहां से बाहर खदेड़ा जाए. इनका आंदोलन असम आंदोलन कहलाया.

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March 16, 2020