दो एशियाई ताकतों का टकराव
DASTAKTIMES|September 2020
दो एशियाई ताकतों का टकराव
पैगॉग सो झील क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से में जिन-जिन चोटियों पर भारतीय सैनिकों ने हाल में अपना कब्जा किया है, उन सभी स्थानों पर भारतीय सैनिकों ने अपने कैंप के चारों तरफ कटीली तारेभी लगा दी हैं और चीनी सेना और सैनिकों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अगर किसी चीनी सैनिक ने इन कटीली तारों को पार करने या हटाने की कोशिश की तो उसका एक प्रोफेशनल आर्मी की तरह जवाब दिया जाएगा।
विवेक ओझा

भारत और चीन के बीच स्थिति दिनोंदिन तनावपूर्ण होती दिख रही है। यह भी कह सकते हैं कि चीन के पास राजनय/ कूटनीति के नाम पर तनाव और विवाद फैलाने की मंशा ही बची रह गई है। 29 अगस्त को भारत-चीन के बीच तनाव फिर से गंभीर रूप में सामने आया, जब पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर झड़प हुई। इस झड़प के साथ ही सामरिक महत्व वाले चुशूल क्षेत्र की सुरक्षा एक संवेदनशील मुद्दा बनकर उभरी। चुशूल सब-सेक्टरपूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास पैगोंग झील के दक्षिण में स्थित है। इस इलाके में थातुंग, ब्लैक टॉप, हेलमेट टॉप, गुरूंग हिल और मगर हिल जैसी चोटियां मौजूद हैं और ये जगजाहिर बात है कि पाकिस्तान हो या चीन दोनों की निगाहें भारत के ऊंचाई पर स्थिति पर्वतीय और पठारीय सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों पर रही है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर यथास्थिति को बदलने के लिए 29-30 अगस्त की रात चीनी सैनिकों ने उत्तेजक कार्रवाई की जिसके साथ ही लद्दाख फ्रांटियर पर चीन के करीब 50 हजार सैनिकों के इकट्ठा होने के बाद स्थिति और गंभीर नजर आयी।

चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास अपनी सैन्य क्षमता के प्रदर्शन के जरिए भारत के मन में भय उत्पन्न करने की कोशिश की है और इस क्षेत्र में सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, रॉकेट फोर्स और 150 फाइटर एयरक्राफ्ट भी तैनात कर रखे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में यह सबसे ज्यादा सैन्य तैनाती है। पेंगोंग झील के उत्तर में चीन द्वारा शुरू किए गए निर्माण कार्य की भी सूचना मिली है। पैगोंग झील क्षेत्र के साथ ही गोगरा-हॉट स्प्रिंग, डेपसांग और दौलत बेग ओल्डी में भी सैनिकों का भारी जमावड़ा देखा गया है, लेकिन ज्यादा गंभीर स्थिति पैगोंग झील क्षेत्र में दिखी है। जिन इलाकों में हाल के समय में स्थिति तनावपूर्ण रही है उनके आसपास रेजांग ला, रेचिन ला, स्यांगुर गैप और चुशूल घाटी जैसे दरें भी हैं। पैगोंग सो झील क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से में जिन-जिन चोटियों पर भारतीय सैनिकों ने हाल में अपना कब्जा किया है, उन सभी स्थानों पर भारतीय सैनिकों ने अपने कैंप के चारों तरफ कटीली तार भी लगा दी है और चीनी सेना और सैनिकों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि अगर किसी चीनी सैनिक ने इन कटीली तारों को पार करने या हटाने की कोशिश की तो उसका एक प्रोफेशनल आर्मी की तरह जवाब दिया जाएगा। चुशूल के दूसरी तरफ चीन का मोल्डो सेक्टर है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने चीन के इस अनैतिक आचरण पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक तरफ जब 31 अगस्त को भारतीय और चीनी पक्षों के ग्राउंड कमांडर स्थिति को बेहतर करने के लिए चर्चा कर रहे थे, तब चीनी सैनिक फिर से उत्तेजक कार्रवाई में लगे थे। पूर्वी लद्दाख का पैंगोंग झील इलाका विवाद का बड़ा केन्द्र रहा है। यह झील करीब 4270 मीटर ऊंचाई पर है और करीब 135 किलोमीटर लंबी है। इसका पूरा क्षेत्र करीब 600 वर्ग किलोमीटर है। झील के लगभग दो-तिहाई हिस्से पर चीन ने कब्जा कर रखा है, जबकि करीब 45 किमी का हिस्सा भारत के अधीन है। झील के पश्चिमी हिस्से को वास्तविक नियंत्रण रेखा बांटती है। ताजा विवाद जो हुआ है वो पैंगोंग झील के दक्षिणी हिस्से में है। यह विवादित एरिया ब्लैक टॉप के नजदीक है, जो चुशूल से करीब 25 किमी पूर्व में है। ब्लैक टॉप पर हालांकि चीन का नियंत्रण है लेकिन यहां भारतीय सेना की उपस्थिति ने उसे परेशान कर दिया है।

चीनी सेना काफिंगर4 के पास ऊंचाई वाली भारतीय जगहों पर कब्जा रहा है जिसे चीन अधिक मजबूती देते हुए उसके आसपास के सभी इलाकों में अपना कब्जा बढ़ाने के लिए लगातार सक्रिय भी रहा है। इसी कुत्सित मानसिकता और उद्देश्य के साथ चीन ने एक सितंबर और सात सितंबर को भी भारतीय क्षेत्रों में घुसपैठ करने की कोशिश की, लेकिन सतर्क भारतीय सैनिकों द्वारा उनके प्रयासों को विफल कर दिया गया। भारतीय सेना ने पैंगोंग त्सो झील के किनारे फिंगर 4 पर ऊंचाई वाली जगह को अपने कब्जे में लेकर चीन के सामने अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया है। इस घटनाक्रम के बाद भारत और चीन की सेनाओं ने पूर्वी लद्दाख में ब्रिगेड कमांडर-स्तर और कमांडिंग ऑफिसर स्तर पर वार्ता की। इस वार्ता का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच संचार माध्यम को बरकरार रखना था।

2008 में जिस चीन ने भारत के साथ सैन्य विश्वास निर्माण बहाली के लिए हैंड इन हैंड मिलिट्री एक्सरसाइज की शुरुआत की थी, उसी चीन ने 2020 में हैंड इन हैंड टसल या कॉन्फ्लिक्ट के जरिए भारत के एक कर्नल और दो जवानों की ही हत्या नहीं कर दी बल्कि उस सैन्य विश्वास बहाली की हत्या कर दी जिसकी दुहाई चीन देता रहा है कि हम भी युद्ध नहीं चाहते, शांति की राहें हम दोनों को खोजनी होगी और यहीं से बड़े स्तर पर दोनों देशों के बीच इस वर्ष तनाव शुरू हुआ। वास्तव में चीन ने अपनी इस कायराना हरकत के जरिए सिद्ध कर दिया है कि वह वैदेशिक संबंधों और अन्य मामलों में भी मोरल टर्पिट्यूड (नैतिक अधमता) का शिकार हो चुका है।

चीन के साथ भारत के वर्तमान सीमा विवाद के कई कारण हैं, कुछ तो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहे हैं और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से अपना असर छोड़ रहे हैं। सबसे पहले तो भारत ने जिस पहलकारी और साहसिक रणनीति के तहत जम्मू कश्मीर राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत लद्दाख और जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया और घोषित ही नहीं किया बल्कि इससे भी आगे लद्दाख के नए मैप में चीन के नियंत्रण वाले अक्साई चिन को और जम्मू कश्मीर के मैप में मुजफ्फराबाद और मीरपुर को भारतीय भू-क्षेत्र के रूप में दर्शाया, उससे चीन और पाकिस्तान को गहरा झटका लगा और लगता भी क्यों नहीं लद्दाख, अक्साई चिन, पैंगोंग झील क्षेत्र, श्योक घाटी, गलवान घाटी, दौलत बेग ओल्डी, देपसांग कॉरिडोर जैसे तमाम सामरिक क्षेत्र चीन और पाकिस्तान की आर्थिक, सामरिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बहुत महत्तवपूर्ण हैं । अगर उदाहरण के तौर पर समझना चाहें तो यूं समझें कि लद्दाख के पूर्वी हिस्से के पास स्थित अक्साई चिन चीन के जिनजियांग प्रांत को पश्चिमी तिब्बत से जोड़ता है और तिब्बत चीन की भू-सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसी तिब्बत के पठारी भागों को काटकर नेपाल से चीन तक रेलवे नेटवर्क स्थापित करने की चीन की योजना है। एशिया का वाटर टॉवर कहा जाने वाला तिब्बत चीन की महत्वाकांक्षाओं का हॉटस्पॉट है। वहीं लद्दाख की बात करें तो यदि चीनी सेना को श्योक और दौलत बेग ओल्डी के इलाके में सामरिक पहुंच मिलती है तो चीनी सेना नुब्रा घाटी और सियाचिन को भी खतरे में डाल सकती है। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा अधिकांशतया भूमि मार्ग से होकर गुजरती है, लेकिन मैंगोंग झील की खास बात है कि यहां से एलएसी जल मार्ग से भी गुजरता है इसलिए यह झील क्षेत्र चीन के लिए सामरिक महत्व का हो जाता है। इस झील के लगभग 45 किलोमीटर पश्चिमी हिस्से पर भारत का नियंत्रण है जबकि शेष हिस्से पर चीन का।यहां यह उल्लेखनीय है कि लद्दाख और कराकोरम श्रृंखला के पूर्व में पूर्वी लद्दाख एलएसी के पश्चिमी सेक्टर को निर्मित करता है। पूर्वी लद्दाख भारत के सबसे ऊंचाई पर स्थित एयरफील्ड दौलत बेग ओल्डी से 18 किलोमीटर उत्तर में कराकोरम दर्रे से गुजरता है और दक्षिण में चुमुर से दौलत बेग ओल्डी तक भारत ने सड़क बना दी है। पैगांग लेक पूर्वी लद्दाख में 826 किलोमीटर लंबे विवादित सीमा के केंद्र के निकट स्थित है, इसलिए इसे चीन की आक्रमता का बार-बार सामना करना पड़ता है। चुशूल घाटी के चलते भी चीन के लिए पैगांग लेक क्षेत्र का महत्व है और इसी कारण से चीन ने इस झील क्षेत्र के अपने हिस्से वाले किनारों पर मोटर गाड़ियां ले जाने वाले सड़कों का निर्माण भी कर दिया है।

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