आधुनिक विश्व में वैज्ञानिक
DASTAKTIMES|August 2020
आधुनिक विश्व में वैज्ञानिक
मनुष्य व्यक्तित्व में पदार्थ का भी हिस्सा है। इसकी समझ के लिए विज्ञान पर्याप्त है। यह यथार्थ सत्य है लेकिन जीवन में सत्य के साथ शिव और सौन्दर्य भी है और सौन्दर्य पदार्थ नहीं है। सौन्दर्य का वैज्ञानिक विवेचन नहीं हो सकता। उसे देखकर गाकर आनंदित हुआ जा सकता है। सौन्दर्य रसपूर्ण भी होता है लेकिन इस सौन्दर्य का रस भी पदार्थ नहीं है इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हम सौन्दर्य को खारिज भी कर सकते हैं। सौन्दर्य और उसका आनंद वैज्ञानिक प्रयोगों से सिद्ध नहीं किया जा सकता। विज्ञान प्रयोग आधारित सत्य का ही विश्वासी है।
हृदय नारायण दीक्षित

दृष्टिकोण की महत्ता है। सही भी है। दर्शन और विज्ञान अंधविश्वासों से मुक्त करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचने वाले लोग पंथिक आस्था और विश्वासों को लेकर प्रश्न उठते हैं। अनेक प्रगतिशील विद्वान भारत के धर्म को भी विश्वास की श्रेणी में रखते हैं। वे वेदों को भी अविश्वास की श्रेणी में रखते हैं लेकिन वेद जीवन अनुभूति की कविता है। इस काव्य में जांचे हुए जीवन सूत्र हैं। वेदों में सतत जिज्ञासा है। प्रश्नों का भरापूरा संसार है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण की सारी शर्ते वेदों के मंत्रों पर लागू होती है लेकिन वैदिक मंत्रों को विज्ञान कहना उचित नहीं होगा। विज्ञान ज्ञान का प्राथमिक चरण है और वेद इसके बाद की अनुभूति।

विज्ञान सहज स्वीकार्य ज्ञान है। वैज्ञानिक तथ्य प्रयोग सिद्ध होते हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों के आधार पर जीवन सरल हुआ है। विज्ञान की उपयोगिता स्वतः सिद्ध है। विज्ञान जानने योग्य को जान रहा है, शेष जानने योग्य को भी देर सवेर जान लेगा। लेकिन पदार्थ का ज्ञान उसकी सीमा है। अस्तित्व का बड़ा प्रपंच पदार्थ नहीं है इसलिए विज्ञान के लिए अज्ञेय है। वह जाना नहीं जा सकता लेकिन जीवन का ही भाग है। यह वैज्ञानिक प्रयोगों की सीमा के परे हैं सो अज्ञेय है। अपरिभाषेय भी है। उसकी परिभाषा असंभव है। उसका निर्वचन नहीं हो सकता। उसे कहा नहीं जा सकता। उसे गाया जा सकता है। अज्ञेय का बखान गेय द्वारा ही संभव है। जीवन पदार्थ नहीं है। पदार्थ क्षणभंगुर होते हैं। जीवन प्राणवान है।

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