"हर किरदार निभाने में अलग तरह की चुनौती रही..."राहुल शर्मा
Mukta|July First 2020
"हर किरदार निभाने में अलग तरह की चुनौती रही..."राहुल शर्मा
किसी को इस बात का अंदाजा नहीं होता कि उस की जिंदगी उसे किस राह पर ले जा कर खड़ी कर दे या रास्ते उसे किस मंजिल तक पहुंचाएं. कुछ ऐसा ही हुआ अभिनेता राहुल शर्मा के साथ. जानिए उन के सफर को उन्हीं के शब्दों में.
शांतिस्वरूप त्रिपाठी

दौसा, राजस्थान निवासी राहुल शर्मा मैडिकल की पढ़ाई कर डाक्टर बनना चाहते थे, मगर ऐसा हो नहीं पाया. वे प्री मैडिकल की परीक्षा ही पास नहीं कर पाए. लेकिन, उन्होंने स्नातक तक की पढ़ाई की. इसी बीच चचेरे भाई की वजह से उन का सामना मौडलिंग से हुआ. उस के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय का वर्कशौप व कुछ थिएटर करने के बाद वे एक दिन अचानक सबकुछ छोड़ कर मुंबई में संघर्ष करने पहुंच गए.

मुंबई पहुंचते ही उन्हें सब से पहले टीवी सीरियल 'कहानी चंद्रकांता की' में अभिनय करने का अवसर मिला. उस के बाद से अब तक वे 'एक घर बनाऊंगा', ‘मिटेगी लक्ष्मणरेखा', 'काल भैरव रहस्य' सहित तकरीबन 1 1 सीरियलों में अभिनय कर एक अलग मुकाम बना चुके हैं. प्रस्तुत हैं

राहुल शर्मा से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश :

मुंबई आने से पहले आप थिएटर से भी जुड़े हुए थे?

देखिए, जब मैं मौडलिंग के चक्कर में दिल्ली पहुंचा तो वहां मेरी आंखें खुली. फिर एक मित्र की सलाह पर मैं ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से अभिनय की वर्कशौप की. उस के बाद मैं ने एक वर्ष के दौरान दौलत बेग जी और सागिर के ‘महानिर्वाण' नामक नाटक में अभिनय किया था, जिस के कई शो हम ने कई शहरों में किए थे. यह नाटक सार्थक नाट्य ग्रुप के साथ किया था. उस के बाद मैं ने 'अंधायुग’ किया, पर डेढ़ माह तक इस के वर्कशौप करने के बाद मैं ने मुंबई आने का निर्णय ले लिया, तो शो न करने की मुझे तकलीफ भी हुई.

एनएसडी में थिएटर की वर्कशौप,नाटक में अभिनय और टीवी सीरियल में अभिनय इन तीनों में आप ने क्या फर्क पाया?

बहुत अंतर है. थिएटर ऐसा माध्यम है जिस में आप सीधे दर्शकों के सामने होते हैं. वहां पर रीटेक की गुंजाइश नहीं होती. कलाकार के तौर पर बहुत ही तेजतर्रार होना पड़ता है. आप को दर्शकों की प्रतिक्रिया के हिसाब से आगे की योजना खुद ही बनानी पड़ती है

जबकि टीवी सीरियल हो या फिल्म हो,यहां पर कलाकार के पास समय का एक निश्चित दायरा होता है. फिल्मों में तो एक दिन में सिर्फ 2-3 दृश्यों की ही शूटिंग करनी होती है. रीटेक की भी सुविधा होती है, तो कलाकार के पास खुद को इम्प्रोवाइज करने का वक्त होता है. पर टीवी में समय की कमी होती है. इसलिए टीवी के लिए काम करते समय जयादा तेजतर्रार होना पड़ता है.

टीवी सीरियल कम समय में ज्यादा अच्छी परफार्मेंस देने की चुनौती रहती है. 12 से 16 घंटे काम करते हुए खुद को फिट रखने की भी चुनौती रहती है. लंबेलंबे संवाद याद रखने की भी चुनौती रहती है. तो वहीं विज्ञापन फिल्म में भी समय के माने होते हैं. कई बार हमें 10 से 12 सैकंड में ही सारी बात कहनी होती है. एक विज्ञापन फिल्म में मुझे 6 सैकंड में ही अपनी बात कहते हुए अभिनय करना पड़ा था.

मुंबई की यात्रा कैसी रही?

मेरी मुंबई में अब तक की यात्रा सुखद ही रही. मुंबई पहुंचने पर मुझे कुछ खास संघर्ष नहीं करना पड़ा. शायद 2 माह के अंदर ही मुझे सीरियल 'कहानी चंद्रकांता की अभिनय करने का अवसर मिल गया था. तब से लगातार काम कर रहा हूं. इन दिनों दंगल टीवी पर प्रसारित हो रहे सीरियल 'प्यार की लुकाछुपी' में लोग मुझे सार्थक के रूप में देख रहे हैं और पसंद कर रहे हैं.

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