वृद्धावस्था में स्वाथ्य सुरक्षा

Swasthya Vatika|January-march2020

वृद्धावस्था में स्वाथ्य सुरक्षा
वृद्धावस्था मानव जीवन का वह पड़ाव है, जहां व्यक्ति एकान्त मेंशान्तिपूर्ण जीवन बिता सकता है, उसकी शारीरिक शक्ति भले ही कम हो जाये, किन्तु अगर उसकी मानसिक शक्ति अर्थात इच्छाशक्ति मजबूत हो , तो वह सभी कार्य कुशलता से कर सकता है। आयु बढ़ना एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसलिये इससे बुढ़ापे की हीन भावना नहीं आनी चाहिए कि मैं तो अब कमजोर हूं, लाचार हूं, दूसरों पर निर्भर हूं, बल्कि इसके विपरीत आत्मविश्वास के साथ आत्मनिर्भर होकर दूसरों का भी सहयोगी बनकर स्वंय को उपयोगी सिद्ध करना चाहिए. वृद्धावस्था जीवन की वह सांझ है, जहां अनुभव का प्रकाश दमकता है, जहां मधुर वाणी की बयार बहती है, जहां प्रेम और स्नेह की भागीरथी प्रवाहित होती है
डॉ.अंजू ममतानी

बाल्यावस्था, युवावस्था एवं वृद्धावस्था ये मनुष्य जीवन की तीन अवस्थायें है । प्रथम अवस्था बाल्यावस्था है । आचार्यों ने बाल्यावस्था के अलग अलग काल वर्णित किये है । काश्यपाचार्य 12 वर्ष तक और अरूणदत्त 16 वर्ष तक बाल्यावस्था का काल निर्धारित करते हैं । शरीर में तीन दोष रहते है वात, पित्त और कफ । जिस तरह अनिल ( वायु ), सूर्य और सोम ( जल ) यह तीन तत्व सृष्टि का धारण करते है उसी तरह वात, पित्त और कफ शरीर का धारण करते है । बाल्यावस्था में कफ का प्राधान्य रहता है । शरीर की वृद्धि इस काल में विशेष रूप से होती है । कफ दोष बल प्रदान कर शरीर वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देता है, इसलिए इस काल वरशा में कफ का प्राबल्य रहता है । द्वितीय अवस्था युवावस्था है, है यह काल 16 से 35 वर्ष तक रहता है । इस काल में शरीर के सभी अंग प्रत्यंग एवं भावों की वृद्धि परिपूर्ण होती है । इसलिए मनुष्य की कार्यशक्ति उत्तम रहती है । इस अवस्था में पित्त का प्राबल्य रहता है । तृतीय अवस्था वृद्धावस्था है 160 वर्ष तक वृद्धावस्था एवं 60 70 वर्ष के आगे जर्जरावस्था कह सकते हैं । इस अवस्था में शरीरभावों का क्षय ( हास ) होने लगता है और धातु क्षय होता है तो वात बढ़ता है । इसी कारण वृद्धावस्था में वात का प्राबल्य रहता है । यह वात प्रकोप वृद्धावस्था के अनेक विकारों का कारण बनता है ।

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