हायपर एसिडिटी फास्ट फूड की देन

Swasthya Vatika|January-march2020

हायपर एसिडिटी फास्ट फूड की देन
वर्तमान भाग दौड़ के युग में मनुष्य के आहार विहार में काफी परिवर्तन आ गया है । आयुर्वेद में आहार के का विशेष रूप से वर्णन किया गया है । षड्रस का वर्णन आयुर्वेद के अंतर्गत ही आता है । मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त व कषाय इन 6 रसों का आहार में समावेश होना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है, ऐसा आयुर्वेद के मनीषियों का कथन है । परंतु आज स्थिति विपरीत है । भोजन में मसालेदार, तीखे, खट्टे, चटपटे पदार्थों का ज्यादा समावेश कर उसे स्वादिष्ट बनाया जाता है, जो हमें उस समय तो स्वाद के कारण रोचक लगते हैं, किंतु कालांतर में रोगकारी सिद्ध होते हैं ।
अंजू ममतानी

आज फास्ट फूड का जमाना है । नूडल्स, मंचूरियन, बर्गर, पिज्जा व अन्य चाइनीज व्यंजन हायपर एसिडिटी के जिम्मेदार हैं । आज आए दिन होटलों की सैर व पार्टियों का आयोजन हो रहा है । जहां कोल्ड ड्रिंक्स तथा मद्यपान की व्यवस्था आम बात हो गई है । इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य का स्तर दिन प्रतिदिन गिर रहा है । भोजन की इन्हीं अनियमितताओं का परिणाम है' हायपर एसिडिटी' जिसका मुख्य कारण कब्ज भी है । आधुनिक दर्द निवारक औषधि के अति प्रयोग से भी एसिडिटी होती है ।

हायपर एसिडिटी से सभी भली-भांति परिचित हैं । आयुर्वेद में इसे अम्लपित्त कहते हैं । आयुर्वेदानुसार पाचन के पित्त तत्व जरूरी है । पित्त जिसे अंग्रेजी में बाइल ( Bile ) के नाम से जाना जाता है, आयुर्वेद में विस्तृत अर्थों का परिचायक है । यह केवल पाचन का ही काम नहीं करता, शरीर की समस्त ऊर्जा का संवाहक भी होता है । पित्तदोष के बढ़ने से ही हायपर एसिडिटी होती है । पित्त की वृद्धि आहार में संयम बरतने से होती है ।

कारण : अम्लपित्त सामान्य रूप से पाया जाने वाला लक्षण है । आजकल जर्दे का गुटका प्रचलित है । इसका भी परिणाम एसिडिटी है । अत्यंत खट्टे, गर्म पदार्थों का सेवन, मद्यपान की लत होना. अति स्निग्ध व पिष्टान्न का सेवन भी एसिडिटी को जन्म देता है । कभी कभी अपचन की स्थिति में भी व्यक्ति पुनः अन्न सेवन करता है, जिससे भी एसिडिटी होती है । कलथी का अधिक सेवन , वेग धारण के कारण भी यह समस्या होती है । इसके अलावा मानसिक कारणों में अत्यधिक तनाव की स्थिति एवं अवसादावस्था भी एसिडिटी के लिए जिम्मेदार हैं । अतः यह केवल अहितकर आहार से ही होने वाली शारीरिक व्याधि नहीं है, बल्कि इसे मानस शारीरिक व्याधि ( Psychosomatic Disorder ) भी कहा जाता है क्योंकि अम्लपित्त के रुग्णों में भय, चिंता, नींद न आना, बेचैनी, अनुत्साह इत्यादि मानसिक लक्षण भी मिलते हैं । कई चिकित्सक उन्हें निद्राजनक या मानसिक औषधियां देते हैं, की वजह से होते हैं । लक्षण पित्तदृष्टि जबकि उनके यह इसलिए उन्हें पित्तशामक औषधि देनी चाहिए ।

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