महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य

Swasthya Vatika|January-march2020

महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य
सुखी एवं प्रसन्न रहने के लिए महिलाओं का शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ और निरोगी होना जरूरी है। लेकिन कई महिलाएं शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हा भी मानसिक तौर पर अस्वस्थ रहती हैं। मानसिक अस्वस्थता का मतलब यह नहीं कि वे विक्षिप्त या अर्द्धविक्षिप्त होती हैं। किसी भी तरह की मानसिक परेशानी, उलझन, तनाव, डिप्रेशन आदि मानसिक अस्वस्थता की निशानी है। वैसे तो स्त्री और पुरुष दोनों ही मानसिक अस्वस्थता के शिकार हो सकते हैं, लेकिन यहां केवल महिलाओं के मानसिक स्वास्थ की चर्चा की जा रही है।
डॉ. विनोद गुप्ता

चूंकि महिलाएं परिवार की धुरी होती हैं, अतः उनका मानसिक रूप से स्वस्थ और प्रसन्न रहना बहुत जरूरी है । अन्यथा इसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है । इसलिए उनके मानसिक स्वास्थ्य को गंभीरता से लेना चाहिए ।

जब कोई महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ रहती है, तो उसमें कई लक्षण देखे जा सकते हैं । उसकी नींद उड़ जाती है यानी अनिद्रा रोग की शिकार हो जाती है । उसका स्वभाव बदल जाता है । वह सदैव विचलित रहने लगती है । कब्ज और एसिडिटी बनी रहती है । भूख, प्यास कम हो जाती है । , माइग्रेन की चपेट में आ सकती है । ऐसा लगता है कि दिमाग की नसें फट जाएंगी । सेक्स के प्रति अरूचि हो जाती है । अपने खाने पीने, पहनने ओढ़ने पर से ध्यान हट जाता है । सामाजिक कार्यक्रमों, मिलने जुलने से कतराने लगती है । उसके चेहरे से हंसी, मुस्कान गायब हो जाती है । उसके जीवन से खुशियां जा चुकी होती है । वह अपने आपको सदैव उदास, थकी हुई पाती हैं ।

जब कोई महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ या परेशान रहती है, तो उसमें जीवन जीने का उत्साह खत्म हो जाता है । उसे जीने का कोई मकसद नजर नहीं आता । उसकी सोच, विचार निगेटिव हो जाती है । उसे चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है । कहीं भी रोशनी की किरण दिखाई नहीं देती । ऐसे में वह आत्महत्या भी कर सकती है ।

मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है । उसे हर बात में चिड़चिड़ाहट छूटती है । उसका व्यवहार उग्र या असंयमित हो जाता है । इसके विपरीत, मानसिक रूप से अस्वस्थ कुछ महिलाएं एकदम शांत, एकांतप्रिय रहने लगती हैं । उनके स्वभाव में यह परिवर्तन परिजनों की समझ से परे होता है ।

मानसिक अस्वस्थता के कई कारण हो सकते है । हर महिला में यह कारण भिन्न हो सकते हैं ।

महिलाओं की अपनी समस्या है जिनसे उन्हें जूझना पड़ता है । कई घर परिवारों में आज भी लड़की जन्म को एक अभिशाप के रूप में लिया जाता है और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है । ऐसे में वह उपेक्षित ही रहती है । परिजनों की उपेक्षा का शिकार रही लड़की की परवरिश भी भेदभावपूर्ण तरीके से होती है । उसे वे तमाम अवसर, साधन, सुविधाएं नहीं मिलतीं, जो कि उनके भाइयों को मिलती है । परिवार और समाज द्वारा बरता जाने वाला यह लिंगभेद उसे मानसिक तौर पर व्यथित करता है । इससे वे मानसिक तौर पर दुखी, परेशान रहती है ।

महिलाओं के जीवन में कुछ विशिष्ट अवस्थाएं आती हैं, वे मानसिक तौर पर परेशान या विचलित हो सकती हैं । इसकी शुरूआत किशोरावस्था से होती है । किशोरावस्था में वे असामंजस्य की स्थिति में होती हैं । घर से बाहर पर मनचलों के फिकरे या सीटियां सुनने को मिलती हैं । स्कूल जाते आते समय रास्ते में गुंडे बदमाश छेड़छाड़ करते हैं । उसका हाथ पकड़ते हैं या बरे इरादे से शरीर को छूते हैं । आमतौर पर हर किशोरी को इसका सामना करना पड़ता है । जो दबंग होती है, वे सामने वाले को मजा चखा देती है और जो सीधी होती है, वे प्रतिरोध नहीं कर पातीं और इस वजह से मानसिक रूप से परेशान रहती है । यह बात वे अपने माता पिता को भी नहीं बतातीं । उन्हें अंदेशा रहता है कि कहीं इस वजह से मां बाप उसकी पढ़ाई ही न छुडा दें ।

यदि कोई लड़की या महिला किसी उम्र में बलात्कार या यौन शोषण की शिकार हुई तो वह मानसिक रूप से इतनी डिस्टर्ब हो जाती है कि ताउम्र उस घटना को भल नहीं पाती । उसकी आंखों के सामने वह दृश्य घूमता रहता है । यदि उसने यह बात परिजनों से छिपाई है, तो इसका अपराधबोध उसे होता है । ऐसी महिलाओं को मानसिक रूप से स्वस्थ बनाने के लिए मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और काउंसलर की आवश्यकता होती है । इससे वे इस सदमे से उभर सकती है ।

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