किडनी विकार

Swasthya Vatika|January-march2020

किडनी विकार
आजदेश में लगभग 5 लाख ऐसे मरीज हैं, जिनकी किडनी पूरी तरह खराब हो चुकी हैं। हर साल एक लाख नए मरीज बढ़जाते हैं। देश के प्रत्येक 2,000 परिवार में से एक परिवार इस बीमारी से ग्रसित है। केवल दो प्रतिशत लोगों को ही उचित उपचार मिल पाता है।

प्रकृति का यह नियम है कि जो पदार्थ शरीर के लिए आवश्यक है, केवल उन्ही का संचय शरीर में साररूप में करती है जो पदार्थ शरीर के लिए अवांछनीय व अनावश्यक है, उन्हें मलरूप में शरीर से बाहर विसर्जित कर देती है । कार्य करने वाले इन अंगों को उत्सर्जक अंग (Excretory organ) कहते हैं । शरीर में गुदा (Anus), वृक्क (Kidney) व त्वचा (Skin) मुख्यतः उत्सर्जक अंग कहलाते हैं जो शरीर से मलों को बाहर निकालने का कार्य कर शरीर को अनुग्रहित करते रहते हैं ।

उत्सर्जक अंगों में किडनी मानव शरीर का महत्वपूर्ण अवयव है जिसमें मल स्वरूप मूत्र निर्मिती की प्रक्रिया होती है जो कि सेम की फल्ली के आकार की उदर में एक दायीं तथा एक बायीं ओर संख्या में दो होती हैं । किडनी को आयुर्वेद में वृक्क व आम भाषा में गुर्दा कहते हैं । प्रत्येक किडनी की लंबाई चार इंच, चौड़ाई 2. 5 इंच तथा भार लगभग 120 से 130 ग्राम तक रहता है ।

किडनी की आंतरिक संरचना

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