आहार ही औषधि है

Swasthya Vatika|January-march2020

 आहार ही औषधि है
आहार चिकित्सा में प्रमुख सिद्धात एक ही है भाँति भाँति के मिश्रणों से बचा जाए; प्राकृतिक आहार को ही साधक की प्रकृति के अनुरूप दिया जाए । धातु परिशोधन व बलपुष्टि के लिए इससे बढ़कर और कोइ साधन नहीं । एक ही आहार से संतोष कर उसे सजीव एवं प्राकृतिक रूप लिया जाए तो उसके चमत्कारी परिणाम होते हैं । वन में करने वाले प्रकृति के संपर्क में रहने वाले पशु पक्षी कहाँ मसालेदार भोजन खाते हैं । वे कभी अस्वस्थ होते देखे नहीं जाते ।

शरीर आहार से बनता है; यह एक सुविदित तथ्य है। मन को भी ग्यारहवीं इंद्रिय कहा गया है। इस प्रकार मन भी शरीर का ही एक भाग हुआ । आहार का स्तर जैसा भी होगा शरीरगत स्वास्थ्य एवं संतुलन भी उससे प्रभावित होगा। व्याधियाँ जितनी आहार के सात्विक-असात्विक तथा पोषण-कुपोषण के कारण होती हैं; उतनी जीवाणु-विषाणुओं के कारण नहीं। इस प्रकार आहार को ही मात्र साध लिया जाए तो परिपूर्ण रूप से स्वस्थ बना रहा जा सकता है। चिकित्सा के पीछे मूलभूत दर्शन यही है। तरह-तरह के सम्मिश्रणों से बचकर यदि एक समग्र आहार व्यक्ति विशेष के लिए सुझाया जा सके, तो मलशोधन और बलबर्द्धन संभव है। इस संबंध में जानकारी का अभाव ही भातियों को जन्म देता है यदि ये भ्रांतियाँ मिटाई जा सकें तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक क्रांति संभव है।

आत्मिक प्रगति का विचार करते ही सर्वप्रथम आहारसाधना की बात सामने आती है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा - कीर्तन, धर्मानुष्ठानों की तरह आहार में सात्विकता सदाशयता के समावेश को; आहारकल्प को भी आध्यात्मिक उत्कर्ष के अनिवार्य आधारों में सम्मिलित किया गया है। ये प्रयोग प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में यदा-कदा चलते रहते हैं। जिस मनोभूमि में, तप – तितिक्षायुक्त बातावरण में यह कल्प-साधना की जाती है; वह कितनी फलदायी होती है; यह वे जानते है जो एक माह. एक ही आहार पर रहे: स्वयं को बदलकर रहे। ऐसा परिवर्तन जो किसी और औषध से संभव नहीं, कायाकल्प के तुल्य ही जिसे ठहराया जा सकता है; मात्र आहार-साधना की ही फलश्रुति है।

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