दशहरा के विविध स्वरूप
Sadhana Path|October 2020
दशहरा के विविध स्वरूप
बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है दशहरा। इस दिन भगवान राम ने युद्ध में लंकाधिपति रावण पर विजय प्राप्त की थी। बुराई पर अच्छाई का यह पर्व देश के विभिन्न हिस्सों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। देश के सभी हिस्सों में इसे मनाने के तरीके भी भिन्न-भिन्न हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक इस पर्व की विभिन्न झांकियों को देखें इस लेख से।
सरस्वती कुमारी

दशहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द संयोजन 'दश व 'हरा' से हुई है, जिसका अर्थ भगवान राम द्वारा राक्षसराज रावण के दस सिरों को काट उसकी मृत्यु के रूप में आंतक की समाप्ति से है। इस कारण इस दिन को विजयदशमी अर्थात अन्याय पर न्याय की विजय के रूप में भी मनाया जाता है। दशहरे से पूर्व हर वर्ष शारदीय नवरात्र के समय मातृरूपिणी देवी नवधान्य सहित पृथ्वी पर अवतरित होती हैं। क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री रूप में मां दुर्गा की लगातार नौ दिनों तक पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के अंतिम दिन भगवान राम ने चंडी पूजा के रूप में मां दुर्गा की उपासना की थी और मां ने उन्हें युद्ध में विजय का आर्शीवाद दिया था। इसके अगले दिन दशमी को भगवान राम ने रावण का अंत कर उस पर विजय पायी, तभी से शारदीय नवरात्र के बाद दशमी को विजयदशमी के रूप में मनाया जाने लगा।

भगवान राम ने रावण को युद्ध में परास्त कर दिया। इसके बाद से प्रतिवर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश में रावण का पुतला जलाया जाता है। इसी परंपरा के साथ दशहरा का समापन होता है लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को मनाने के तरीके भी अनेक हैं।

रोहिड़ा का दशहरा

आमतौर पर रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले सूर्यास्त के बाद ही जलाए जाते हैं। लेकिन राजस्थान के माउंट आबू से 50 किलोमीटर दूर रोहिड़ा देश का इकलौता ऐसा स्थान है जहां रावण रात के 12 बजे तक जलता है। इसके पीछे यहां के लोगों की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। दरअसल रावण को अहंकार का प्रतीक माना जाता है। रावण ब्राह्मण था और प्रकांड विद्वान भी। रावण जो अहंकार का प्रतीक है उसका दहन यहां रात के 12 बजे किया जाता है क्योंकि यह समय महाकाल का होता है और ऐसा माना जाता है कि इस वक्त रावण का दहन होने से रावण यानी अंधकार हमेशाहमेशा के लिए खत्म हो जाता है। यह पूजा डेढ़ घंटे तक चलती है। चारों दिशाओं का पूजन कर प्रार्थना की जाती है कि हर दिशा का अहंकार दूर हो और सब जगह प्रकाश फैले। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक दस दिशाएं होती हैं और सभी दिशाओं की पूजा की जाती है। रावण दहन से पहले यहां भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है। शोभा यात्रा में भगवान राम की सेना, महाराणा प्रताप की सेना और छत्रपति शिवाजी की भी सेना होती है। छत्रपति शिवाजी घोड़े पर सवार होते हैं। शोभा यात्रा के दौरान गीत-संगीत का दौर चलता रहता है।

कुल्लू का दशहरा

articleRead

You can read up to 3 premium stories before you subscribe to Magzter GOLD

Log in, if you are already a subscriber

GoldLogo

Get unlimited access to thousands of curated premium stories, newspapers and 5,000+ magazines

READ THE ENTIRE ISSUE

October 2020