संस्कृत साहित्य में रामकथा
Sadhana Path|August 2020
संस्कृत साहित्य में रामकथा
संस्कृत साहित्य में रामकथा का प्रतिपादन सर्वप्रथम आदिकवि वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' शीर्षक ग्रंथ में किया गया है। प्राचीन कथाओं के अनुसार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने स्वप्न में महर्षि वाल्मीकि को दर्शन देकर उन्हें रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया तथा यह आश्वासन भी दिया कि वे अपने काव्य में राम के चरित्र का निर्माण जिस प्रकार से करेंगे राम अपने जन्म के पश्चात् उसी प्रकार का आचरण करेंगे।
- डॉ. हनुमान प्रसाद उत्तम

इस प्रकार राम के जन्म से पूर्व ही इस ग्रंथ का निर्माण वाल्मीकि द्वारा किया गया। ऐसी मान्यता है, यद्यपि आदि कवि ने राम के चरित्र की कल्पना सभी गुणों आगार, कौशिल्या के परमप्रिय, हिमालय के समान धैर्यवान, समुद्र की भांति गंभीर, पृथ्वी की भांति क्षमाशील, चन्द्रमा के समान कांतिमान तथा विष्णु के समान बलवान रूप में की तथापि मूल रूप से उन्हें नारायण का चरित्र न देकर नर श्रेष्ठ के रूप में ही प्रस्तुत किया-

आलान मानुषं मन्ये रामं दशरथाताज

यद्यपि बालकांड एवं उत्तरकांड में राम के परब्रह्म स्वरूप का प्रतिपादन करने वाले अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। वाल्मीकि की अहिल्या राम के चरणों का स्पर्श पाकर पाषाणी से मानवी या दैवी रूप धारण नहीं करती बल्कि गौतम द्वारा अभिशप्त होने पर लोक लज्जा के कारण वह लोगों की दृष्टि से दूर एक निर्जन स्थान पर रहती है जहां जाकर राम व लक्ष्मण उनका चरण स्पर्श करके मुनि विश्वामित्र की प्रेरणा से उसे सामाजिक मान्यता प्रदान करते हैं। बाद में महर्षि गौतम उसे पुनः स्वीकार कर लेते हैं। परशुराम संवाद में भी यहां अलौकिकता का अभाव है। इस प्रकार वन गमन, लक्ष्मण शक्ति तथा युद्ध में लक्ष्मण के घायल हो जाने व इसी प्रकार के अनेक प्रसंगों में वाल्मीकि के राम में मानव सुलभ दुर्बलताएं भी दृष्टि गोचर होती हैं। कुल मिलाकर एक आदर्श शासक तथा अनुकरणीय मानव के रूप में राम का चरित्र गढ़ा गया है। किंतु इसके विपरीत संस्कृत साहित्य के सर्वाधिक विशाल ग्रंथ भुशुण्डि रामायण' में जिसे इसके ग्रंथकार ने आदि रामायण कहकर संबोधित किया है।

राम वेदों के लिए आगोचर, सगुण- निर्गुण भेदाभेद सहित परमतत्व है। उनका संस्थान चिदानंद व परम स्थान चिन्मयानंद पूर्ण सीता लोक है। पृथ्वी पर कौशलपुरी ही उनका त्रिलोक है। वे ही विमोक्ता व फल प्रदाता है। गोपियों द्वारा अनन्य भाव सीता की आराधना करने पर वे प्रमोदवन लीला में उन्हें प्रविष्ट कराकर महारास करते हैं। जिसे देखने स्वयं शिव वहां जाते हैं किंतु गोपियों द्वारा अवज्ञा करने पर राम के वियोगजन्य दुख से पीड़ित होने का श्राप देते हैं। इस श्राप से मुक्ति प्राप्ति के लिए 'रामगीता' के माध्यम से 18 अध्यायों में तत्वज्ञान का उपदेश दिया गया है। कुल मिलाकर भागवत की कृष्णलीला इसमें रामलीला के रूप में वर्णित है। ऐतिहासिक दार्शनिक एवं धार्मिक दृष्टियों से यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें कुल 37000 श्लोकों में राम के चरित्र का वर्णन किया गया है।

महर्षि वेद व्यास ने 18 पुराणों तथा 'महाभारत' नामक विशाल ग्रंथ की रचना की जिसमें समस्त पुराणों में ब्रह्मांड पुराण के अन्तर्गत जिन अध्यायों में राम के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन किया गया है उसे 'अध्यात्म रामायण' का नाम दिया गया है। श्रीमद्भागवत के नवम् स्कंध के दसवें अध्याय में राम के अवतरण से राज्याभिषेक तक की घटनाएं कुल 55 श्लोकों में प्रायः इत्ति वृत्तात्मक ढंग से वर्णित है।

अथर्ववेदीय राम पूर्व तापनीय उपनिषद 'राम' शब्द के विविध अर्थ प्रस्तुत करती है-

रमन्ते योगिनोय स्मिन

नित्यानंद चिदात्मनि।

इति राम पदेना सौ परब्रह्मभि धीयते॥

इसी प्रकार- 'रीति राजते वा ही स्थितिःसन इति रामः'

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