मुद्राएं जो जो रोग मिटाएं
Sadhana Path|July 2020
मुद्राएं जो जो रोग मिटाएं
हाथों की दस उंगलियों से विशेष प्रकार की आकृतियां बनाने की कला को हस्त मुद्रा कहा जाता है। किस प्रकार आप अपनी उंगलियों से विभिन्न मुद्रा बनाकर स्वयं ही अपनी चिकित्सा कर सकते हैं जानते हैं लेख से।
नीलम

हस्त मुद्रा चिकित्सा के अनुसार हाथ की पांचों उंगलियां पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के माध्यम से झ तत्त्वों को बल देती रहती हैं। हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़कर भिन्न-भिन्न मुद्राएं बनाई जाती हैं। ये अद्भुत मुद्राएं करते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं। पद्मासन, स्वस्तिकासन, सुखासन, वज्रासन में करने से जिस रोग के लिए जो मुद्रा वर्णित उसको इस भाव से करें कि मेरा रोग ठीक हो रहा है, तब ये मुद्राएं शीघ्रता से रोग को दूर कसे में लग जाती हैं। बिना भाव के लाभ अधिक नहीं मिल पाता। दिन में 20-30 मिनट तक एक मुद्रा को किया जाए तो पूरा लाभ प्राप्त हो जाता है।

ज्ञान-मुद्रा

बड़े-बड़े ज्ञानी पुरुष जब जगत् को बोध देते हैं, तब जानमुद्रा करते हैं। भगवान श्री शंकराचार्य ने ज्ञानमुद्रा का वर्णन दक्षिणामूर्तिस्त्रोत्र में किया है -

स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो भद्रया मुद्रया।

तस्मै श्री गुरुपूर्तये नमः इदं श्री दक्षिणामूर्तये॥

अंगूठ ब्रह्म है। छोटी अंगुली सत्व गुण है। अनामिका अंगुली रजोगुण है। सबसे बड़ी जो अंगुली है, वह तमोगुण है। तर्जनी जीवस्वरूप है, जीव की प्रतीक है। जीव में अभिमान रहता है और इससे संस्कृत भाषा में इसको तर्जनी कहते हैं। पहले के वैर को याद करके किसी को बदला लेने की इच्छा हो, तो कनिष्ठ अंगुली आगे नहीं आएगी, अंगूठा भी आगे नहीं आएगा। तर्जनी ही आगे आएगी और ऐसा कहेगी कि समय आने दो, पीछे मैं इसको देख लूंगी। इस अंगुली में अभिमान है। इस अंगुली से तिलक नहीं होता । माला करने बैठो तो इस अंगुली का माला से स्पर्म नहीं होना चाहिए । यह जीव स्वरूप है।

यह जीव तीन गुणों में मिलता है। इस जीव में सत्वगुण बहुत कम है। सुबह घण्टेदो घण्टे भगवद् सेवा स्मरण करने में थोड़ा हृदय पिघलता है, जब जीव सतगुण में रहता है। बाकी समस्त दिवस अधिकांश भाग में यह रजोगुण ही रहता है। रात्रि के समय तमोगुण में जाता है। इस प्रकार यह जीव तीनगुणों में रमा रहता है।

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