रामकृष्ण परमहंस- ईश्वरीय चेतना एवं धार्मिक सौहार्द के प्रवर्तक

Sadhana Path|February 2020

रामकृष्ण परमहंस- ईश्वरीय चेतना एवं धार्मिक सौहार्द के प्रवर्तक
महान संत, साधक, विचारक एवं सभी धर्मों की एकता पर बल देने वाले आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस भारत की 19वीं शताब्दी के प्रमुख संतों में से एक हैं। मां काली के अनन्य भक्त श्री रामकृष्ण का मानना था कि धर्म अलग-अलग रास्ते हैं लेकिन ये सभी एक ही लक्ष्य तक लेकर जाते हैं।
डॉ. विभा खरे

18 फरवरी 1836 को पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के कमरपुकुर गांव में एक बहुत ही गरीब, धर्मपरायण और रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ गदाधर चट्टोपाध्याय का जो आगे चलकर रामकृष्ण परमहंस के नाम से विख्यात हुए । उनके माता-पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय और चंद्रमणि देवी थे । उनके अनुयायियों के अनुसार, रामकृष्ण के माता पिता ने उनके जन्म से पहले अलौकिक घटनाओं और दर्शन का अनुभव किया । रामकृष्ण ने 12 वर्षों तक कुछ नियमितता के साथ एक गांव के स्कूल में पढ़ाई की, लेकिन बाद में उन्होंने पारंपरिक स्कूली शिक्षा को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि उन्हें' रोटी कमाने वाली शिक्षा' में कोई दिलचस्पी नहीं है ।

रामकृष्ण का आरंभिक जीवन

सात वर्ष की उम्र में ही गदाधर के पिता की मृत्यु हो गई, तब परिस्थितियां इतनी विपरीत हो गई कि पूरे परिवार का पालन-पोषण करना कठिन होता चला गया और आर्थिक कठिनाइयां घेरने लगी लेकिन फिर भी गदाधर का साहस कम नहीं हुआ।

इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय कलकत्ता (कोलकाता) में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गये। रामकृष्ण का अन्तर्मन अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था। संकीर्णताओं से वह बहुत दूर थे। अपने कार्यों में लगे रहते थे।

दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना

दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना करने के कारण यह अफवाह फैल गई कि रामकृष्ण का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। रामकृष्ण की मां और बड़े भाई रामेश्वर ने रामकृष्ण की शादी कराने का निर्णय लिया।

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