बीसवीं सदी का अप्रतिहत व्यक्तित्व

Sadhana Path|February 2020

बीसवीं सदी का अप्रतिहत व्यक्तित्व
एक परमार्थ चेता संतहमारा देश धर्म प्रधान है। इसमें अनेक पंथ हैं, अनेक ग्रंथ हैं, अनेक साधना पद्धतियां हैं, अनेक धर्म प्रवक्ता और प्रशिक्षक हैं। समस्या है, हम कहां-कहां जाएं? सन् 1983 गुजरात यात्रा के दौरान एक प्रसिद्ध चिकित्सक ने आचार्यश्री महाप्रज्ञ से उक्त प्रश्न पूछा।
साध्वी कनकश्री 'लाडनूं'

प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने सीधा-सादा, पर सटीक उत्तर दिया-'आपको कहीं पर जाने की जरूरत नहीं है। स्वयं के पास और स्वयं के साथ रहना सीख लें, आपका काम हो जाएगा।' 'प्रश्नकर्ता प्रसन्न हुआ, प्रभावित हुआ। कहा-आज सामान्यतः हर साधु-संत या धर्माधिकारी स्वयं को और स्वयं के ग्रंथों- पंथों को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में लगा रहता है, वहां आचार्य महाप्रज्ञ आत्मा की बात करते हैं। आत्म-सिद्धि और आत्मशुद्धि की बात करते हैं। कितना ऋजु और स्वस्थ दृष्टिकोण है उनका। अपेक्षा है, महाप्रज्ञ की परमार्थ दृष्टि हमें उपलब्ध हो, उन जैसा परमार्थचेता संत धरती पर कभी-कभी अवतरित होता है।

महाप्रज्ञ आत्म प्रज्ञा के स्वामी थे। ज्ञान के अक्षय सागर थे। उनका ज्ञान उधार लिया हुआ नहीं, भीतर से प्रस्फुटित होने वाला महास्त्रोत था। एक बार हिसार चातुर्मास में मैंने जिज्ञासु भाव से पूछा-आप जब प्रवचन करते हैं, आपकी सरस्वती सहज प्रवाहित होती है। गंभीर से गंभीर विषय को आप श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में सा इतनी सहजता के साथ संप्रेषित कर देते हैं, की जैसे आपको सोचने विचारने की अपेक्षा प ही नहीं रहती, ऐसा कैसे संभव होता है? । उन्होंने कहा- 'मैं सोच-विचार की के दुनिया में कम रहता हूं। सत्य का साक्षात्कार निर्विचारता की स्थिति में ही होत संभव है। निर्विचारता से निथरकर आया विचार ही सम्यक और प्रभावशाली होता जा है। उसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न की ल अपेक्षा नहीं रहती।'

मेरा अगला प्रश्न विनम्र था- आपके प्रवचन प्रभावोत्पादक, ज्ञान-गर्भित और प्रतिपाद्य विषय की समग्रता लिए हुए होते स्रो हैं। श्रोता आपके एक-एक प्रवचन से में अनेक ग्रंथों का सारतत्त्व उपलब्ध कर प्रज्ञ सकते हैं। आश्चर्य होता है, आप इतने श्रुत सारे ग्रंथ कब पढ़ते हैं? उन्होंने मधुर मुस्कान बिखेरते हुए कहा- 'मैं तुम लोगों जितना पढ़ता नहीं हूं।' अबोध जिज्ञासा को समय के अंतराल के पश्चात समाधान मिला- ज्ञानी व्यक्ति को पढ़ने की अपेक्षा नहीं रहती, ग्रंथों को पढ़कर पंडित बन सकते हैं, ज्ञानी नहीं। पाण्डित्य उधार होता है, आरोपित होता है, वह कुंड के पानी की तरह सीमित होता है। जितना । भरो, उतना निकालो। प्रज्ञा आरोपित नहीं होती, न ही अधीत होती है। वह साधना द्वारा उपलब्ध होती है। अंतःप्रज्ञा जब जागती है, ज्ञान के स्रोत प्रवाहित होने लगते हैं। अतीन्द्रिय ज्ञान कुंए के जल की भांति असीम होता है। जितना चाहो, निकालते जाओ। वास्तव में आचार्यश्री महाप्रज्ञ की निर्मल चेतना से प्रज्ञा के इतने स्त्रोत प्रस्फुटित हो कर बहते रहते थे, जिन में सत्य स्वतः उद्भाषित होता था। उनकी प्रज्ञामयी चैतन्य रश्मियों पर अथाह/अपार श्रुतराशि तैरती-सी प्रतीत होती थी।

अप्रतिहत व्यक्तित्व

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