संन्यासियों का क्या धर्म है

Sadhana Path|February 2020

संन्यासियों का क्या धर्म है
यह अपने मन में निश्चित जाने कि दण्ड, कमण्डलु और काषायवस्त्र आदि चिह्न धारण धर्म का कारण नहीं है, सब मनुष्यादि प्राणियों की सत्योपदेश और विद्यादान से उन्नति करना संन्यासी का मुख्य कर्म है।
स्वामी दयानंद सरस्वती

धर्म तो पक्षपातरहित न्यायाचरण, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग, वेदोक्त ईश्वर का आज्ञापालन, परोपकार, सब आश्रमियों का अर्थात् सब मनुष्यमात्र का एक ही है, परन्तु संन्यासी का विशेष धर्म यह है कि-

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।

सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥1॥

क्रुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं

वदेत् । सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां

वदेत् ॥2॥

जब संन्यासी मार्ग में चले, तब इधर-उधर न देख कर, नीचे पृथ्वी पर दृष्टि रख के चले। सदा वस्त्र से छान के जल पिए, निरन्तर सत्य ही बोले, सर्वदा मन से विचार के सत्य का ग्रहण कर असत्य को छोड देवे।

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