प्रज्ञापुरुष आचार्य महाप्रज्ञ

Sadhana Path|February 2020

प्रज्ञापुरुष आचार्य महाप्रज्ञ
महाप्रज्ञ शब्द सामने आते ही एक | जिज्ञासा उभरती है कि महाप्रज्ञ कौन हो सकता है? यदा कदा 'महाप्रज्ञ' की शाब्दिक और आर्थी मीमांसा का प्रयत्न करती रहती हूं । शब्द और अर्थ मीमांसा के क्षणों में मुझे यह अनुभव होता है कि' महाप्रज्ञ' शब्द में एक शक्ति है, एक अर्थगांभीर्य है, प्राणवत्ता और गुणवत्ता है, उदात्त चेतना का अवबोध है, आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण का संबोध है ।
मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुतविभा

जैन साहित्य में ' प्रज्ञ'' महाप्रज्ञ, आशुप्रज्ञ', और भूतिप्रज्ञ का प्रयोग मिलता है । पातंजल योग दर्शन में ' ऋतंभरा प्रज्ञा' और गीता में स्थितप्रज्ञ' की व्याख्या उपलब्ध है । बौद्ध साहित्य में पञ्जा की चर्चा की गई है । उत्तराध्ययन सूत्र में गौतम ने कहा पण्णा समिक्खए धम्मं तत्तं तत्तविणिच्छयं धर्म का दर्शन और तत्त्व का निश्चय प्रज्ञा से होता है । यह प्रज्ञा इंद्रिय ज्ञान से प्राप्त प्रत्ययों का विवेक करने वाली बुद्धि नहीं है । इसका स्रोत है अतीद्रिय चेतना । आयारचूला में बताया है कि समाधिस्थ मुनि की प्रज्ञा बढ़ती है । नंदीसूत्र के अनुसार अश्रुतनिश्रित आभिनिबोधिक ज्ञान अध्ययन निरपेक्ष होता है । यही प्रज्ञा है जिसे हम अंर्तदृष्टि भी कह सकते हैं । इस दृष्टि से आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी प्रज्ञा की जीवंत प्रतिमा थे । वे इंद्रिय, मन और बुद्धि से परे' प्रज्ञा' के स्तर पर जीवन जीते थे ।

प्रज्ञा के स्तर पर जीने वाला व्यक्ति ही पज्य पुरुष होता है । उसके सामने प्रियता और अप्रियता के चुनाव का प्रश्न नहीं रहता । उसकी चेतना समत्व में प्रतिष्ठित हो जाती है । आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी इसी चेतना का निरंतर अनुभव करते थे । इसीलिए उनका आकर्षण असीम के प्रति था, ससीम के प्रति नहीं । उनकी साधना के केन्द्र में आत्मा थी, शरीर नहीं । वे शरीर में रहते थे, पर शरीर के स्तर पर जीते नहीं थे । वे चेतना उनके के स्तर पर जीते थे, अथवा आत्मा ज्ञान का स्रोत केवल बौद्धिकता नहीं था, बुद्धि से प्राप्त ज्ञान कुंड के पानी के समान होता है । जितना पानी कुंड में डालो, उतना निकाल लो, प्रज्ञा कूप जल के समान है । उसका स्रोत निरंतर प्रवाहित रहता है । प्रज्ञा के जागृत होने पर अंर्तदृष्टि सहज ही प्राप्त हो जाती है । ज्ञान का वह स्रोत उद्घाटित हो जाता है, जहां से प्रतिक्षण ज्ञान की निर्मल जल शशि आती रहती है । आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने इस प्रज्ञा चेतना का साक्षात्कार किया था और फिर उससे प्राप्त अक्षय और अखूट ज्ञान शशि को मुक्त भाव से जन जन तक पहुंचाया ।

निदिध्यासन

जीवन विकास के तीन स्रोत हैं श्रवण, मनन और निदिध्यासन । प्रज्ञा पुरुष वह होता है जो श्रवण और मनन तक ही सीमित नहीं रहता, निदिध्यासन ( सेल्फ रियलाइजेशन ) के स्तर पर जीता है । हम शब्दों की दुनिया में जीते हैं, इसलिए सुनने का अभ्यास अधिक है, मनन का कम । जितना मनन करते हैं, निदिध्यासन उससे बहुत कम करते हैं । आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी सुनते थे, मनन करते थे, किन्तु वहां रूकते नहीं थे । वे निदिध्यासन की भूमिका में सतत रमण करते थे । श्रवण और मनन से अधिक निदिध्यासन में विश्वास करते थे, इसीलिए ज्ञान के अथाह सागर में निमज्जन कर बहुमूल्य मुक्ताएं हस्तगत करते थे ।

स्वाध्याय का एक अंग है -' अनुप्रेक्षा' । यह आचार्य श्री महाप्रज्ञजी का प्रिय विषय था । किसी भी श्लोक अथवा गाथा की अनुप्रेक्षा से उसके मर्म तक सहजता से पहुंच जाते थे । आचार्य श्री महाप्रज्ञजी स्वयं लिखते हैं जितना प्रयत्न पढ़ने का होता है, उतना उसके आशय को समझने का नहीं होता । जितना प्रयत्न लिखने का होता है, उतना तथ्यों के यथार्थ संकलन का नहीं होता। अपने प्रति अन्याय न हो, इसका जितना प्रयत्न होता है, उतना दूसरों के प्रति न्याय करने का नहीं होता। गहरी डुबकी लगाने वाला गोताखोर जो पा सकता है, वह समुद्र की झांकी पाने वाला नहीं पा सकता।'

आध्यात्मिक चेतना का जागरण

प्रज्ञा पुरुष वह होता है, जिसका तीसरा नेत्र जाग्रत हो जाता है, जिसकी आध्यात्मिक चेतना का जागरण हो जाता है। आचार्य श्री महाप्रज्ञजी के प्रतिदिन के व्यवहार में हम इसका अनुभव करते थे।

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