जीवन में राग रंग का मेल है होली

Sadhana Path|March 2020

जीवन में राग रंग का मेल है होली
"होली वास्तव में बसंत उत्सव श्रृंखला की पूर्णता का प्रतीक उत्सव है। होली का एक ही अर्थ है राग और रंग अर्थात् संगीत के उन सातों स्वरों का सान्निध्य जिनके बिना प्रकृति भी नहीं रह सकती और रंग अर्थात प्रकृति का सर्वाधिक मोहक स्वरूप।"
सुशील सरित

फसल कटने के बाद धरती से उठती सौंधी सुगन्ध, सरसों की झूमती फसल का पीलापन रंग आम्र मंजरी से आती मादकता की बयार इन सबको अपने आंचल में बांधे फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व होली कब प्रारंभ हुआ, यह कहना तो मुश्किल है लेकिन अगर पौराणिक संदर्भो की बात करें तो दैत्यों के आदि पुरुष कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्रों हिरण्यकश्यप एवं हिरण्याक्ष में से अधिक शक्तिशाली एवं ब्रह्माजी से तप द्वारा अमर होने का वर (कि वह न मानव, न पशु, न दिन, न रात, न घर, न बाहर, न अस्त्र, न शस्त्र किसी से भी मारा न जा सके) प्राप्त हिरण्यकश्यप और उसके विष्णु पूजक पुत्र प्रह्लाद की द्वंद कथा का रोचक मोड़ है यह उत्सव।कथा के अनुसार हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को विष्णु उपासना से विरत करने हेतु बेहद यातनाएं एवं प्रताड़ना दी और अंत में अपनी बहन होलिका को, जिसे अग्नि में न _जलने का वरदान प्राप्त था, आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती हुई अग्नि में बैठ जाए। होलिका ने भाई की आज्ञा मानकर ऐसा ही किया किंतु आश्चर्य, परिणाम विपरीत निकला अर्थात् होलिका तो जल गई किंतु प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ।

विध्वंस पर सृजन की विजय हुई, तभी से होलिकोत्सव मनाना प्रारम्भ हुआ। हिरण्यकश्यप हिरण्यकरण वन नामक स्थान का राजा था। यह वर्तमान समय में राजस्थान के हिण्डौन नामक नगर में स्थित है। हिण्डौन आज भी एक पौराणिक एवं ऐतिहासिक नगर के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे लाल पत्थरों की नगरी भी कहा जाता है। अरावली पर्वत के निकट बसा यह नगर प्राचीन काल में मत्स्य राज्य के अधीन था किंतु हिरण्यकश्यप की राजधानी होने के कारण इसे हिराणकस की खेर भी कहा जाता है। यहां हिराणकस (हिरण्यकश्यप) का मंदिर प्रह्लाद कुंड नरसिंह मंदिर, हिरनाकस का कुआं और धोबी पाखड़ जैसे स्मारक इस पौराणिक तथ्य का प्रमाण माने जा सकते हैं। मान्यता है कि धोबी पाखड के निकट ही वह स्थान है जहां होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी और स्वयं जल गई। इस स्थान को होलिका दाह कहा जाता है।होली पर यहां विशाल उत्सव होता है ।

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