जिन्होंने बदल दिया शहादत के मायने...
जिन्होंने बदल दिया शहादत के मायने...
23 मार्च 1931, भारत में दमनकारी ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में उठे तीन क्रांतिकारियों को फांसी दी गई। इस दिन से पहले तक इन तीनों युवाओं भगत सिंह, शिवराम राजगुरू और सुरवदेव थापर को केवल भारत के लोग जानते थे। लेकिन फांसी के बाद ये तीनों विश्व भर में क्रांति के प्रतीक बन गए।
प्रिंस भान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने वाले सभी क्रांतिकारियों का व्यक्तित्व इतना विराट था कि आप एक शब्द विशेष सुनते ही सीधे उन्हीं को याद करते हैं। जैसे कि अहिंसा से महात्मा गांधी, समाजवाद से जवाहर लाल नेहरू, समानता से भीमराव अम्बेडकर और शहादत से भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव।

शहादत...क्रांति के इस सबसे ऊंचे मुकाम को हासिल करने का मौका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कई लोगों को मिला फिर चाहे वो खुदीराम बोस हों, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, लाला लाजपत राय, शहीद कुयिली या फिर जतिन दास।

लेकिन भगत सिंह और उनके साथियों ने शहादत के मायने बदल दिए। अदालत में ट्रिब्यूनल के सामने दिए गए उनके तर्कों और जवाबों ने ऐसी चोट मारी कि इतिहास के पन्नों पर सदा के लिए के लिए निशान छोड़ गए। लाहौर षड्यंत्र अभियोग की सुनवाई में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। ऐसा नहीं है कि उनकी शहादत का दर्जा अन्य किसी भी स्वतंत्रता सेनानी से ऊपर या नीचे है लेकिन उन्हें अलग बनाया उनके मरने के तरीके ने...

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March 2020