चलो बरसाने खेलैं होरी...

Sadhana Path|March 2020

चलो बरसाने खेलैं होरी...
ब्रज के बरसाना गांव की लट्ठमार होली की मस्ती राधा-कृष्ण की भक्ति के रंग में भी रंगी होती है। यहां की होली में प्रमुरव रूप से नंदगांव के पुरुष और बरसाने की महिलाएं शामिल होती हैं। जब नंदगांव के पुरुषों की टोली रंग रवेलने पिचकारियां लेकर बरसाना पहुंचती हैं तो यहां की महिलाएं उनपर जमकर लाठियां बरसाती हैं, लेकिन फिर भी यह द्वेष का नहीं प्रेम और मस्ती का रंग होता है।
डॉ. हनुमान प्रसाद 'उत्तम'

रंग का त्योहार होली तो अपने आप में ही अनूठा और खास होता है और उसमें भी खास है ब्रज की होली, जहां एक तरफ रंग बरसते हैं, दूसरी तरफ लाठियां भी चलती हैं और सभी रंग जाते हैं प्रेम और भक्ति के रंग में। यहां तक कि मंदिरों की छटा भी निराली हो जाती है। पूरे ब्रजमंडल में बसंत पंचमी से लेकर चैत्र कृष्ण दशमी तक होली का रंग छाया रहता है। चैत्र कृष्ण द्वितीया से चैत्र कृष्ण पंचमी तक यहां होली अपने उत्सर्ग पर रहती है, जिसे देखने के लिए हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहां आते हैं।

ब्रज के मंदिरों में बसंत पंचमी से ही ठाकुर जी के दैनिक शृंगार में गुलाल का प्रयोग प्रारंभ हो जाता है। साथ ही, इन मंदिरों में राजभोग के बाद नित्य प्रसाद के रूप में भक्तों पर गुलाल की वर्षा की जाने लगती है। शिवरात्रि से ढोल के साथ रसिया गान प्रारंभ हो जाता है। भक्त भांग और ठंडाई की मस्ती में नाचने- झूमने लगते हैं। ब्रज में होली की विधिवत शुरुआत फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मथुरा से 18 किलोमीटर दूर मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले से होती है। यहां श्रीराधारानी का भव्य मंदिर भी है। कहा जाता है कि यहां पर भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी के साथ रासलीला की थी। साथ ही श्रीराधारानी ने यहां स्थित प्राचीन कुण्ड में से प्रकट होकर श्रीहरिवंश जी को दर्शन दिए थे। बाद में गोस्वामी वनमाली दास ने यहां होली का उत्सव मनाना प्रारंभ किया था, जो आज भी अपनी सनातन परंपराओं को निभा रहा है।

बरसाने की होली सबसे निराली

मानसरोवर गांव में लगने वाले राधारानी के मेले के 15 दिनों बाद फाल्गुन शुक्ल नवमी को राधारानी की बाललीला स्थली और राधारानी की प्रणय स्थली बरसाने में नंदगांव के हुरियारों (पुरुष) और बरसाने की गोपिकाओं के मध्य लट्ठमार होली होती है क्योंकि कृष्ण नंदगांव के थे और राधारानी बरसाना की। बरसाने की लट्ठमार होली में अन्य स्थानों की होली के अनुरुप रंग-गुलाल एवं नृत्य संगीत के अलावा लाठियों से होली खेलने की जो विशिष्टता है, वह इस बात की परिचायक है कि राधा-कृष्ण की लीला भूमि के कण-कण में आज भी इतना प्रेम व्याप्त है कि यहां लाठियां चलने के बावजूद प्रेम-रस बरसता है। इसी प्रकार नंद गांव की गोपिकाओं और बरसाने के हुरियारों के बीच फाल्गुन शुक्ल दशमी को लट्ठमार होली होती है।

मंदिरों पर भी चढ़ता होली का रंग

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