ग्रामीण भारत की महिलाओं के साहस को सलाम
ग्रामीण भारत की महिलाओं के साहस को सलाम
भारत की आधी आबादी आज अपने हाथों अपनी किस्मत लिरव रही है, अपनी दुनिया बदल रही है और देश एवं समाज को तरक्की की राह दिरवा रही है और इसमें ग्रामीण महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। तो मिलते हैं कुछ ऐसी ही ग्रामीण नायिकाओं से जिन्होंने अर्थिक अभावों में भी संभावनाओं को तलाश लिया।
प्रिंस भान

भारत की महिलाएं आज विश्व में अपना नाम कमा रही हैं। जहां पहले एक ओर पहले भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति कई अन्याय किए जाते थे तो वहीं अब महिलाओं ने सशक्तीकरण की बागडोर खुद अपने हाथ में ही ले ली है।

राजनीति का मंच हो या सिनेमा की दुनिया, खेल का मैदान या विज्ञान का आसमान, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है जिसे भारत की महिलाओं ने न भेदा हो। लेकिन प्राय: दुनिया में अपना परचम लहराने वाली महिलाओं की फेहरिस्त में भारत के ग्रामीण इलाकों की महिलाओं का उल्लेख नहीं मिल पाता है। इसकी वजह शिक्षा की कमी है जिसे दूर करने के लिए विभिन्न स्तरों पर कई कदम उठाए जा रहे हैं और दूसरी वजह है मीडिया की नजरअंदाजगी।

अपने परिवार को सम्भालते हुए, रूढ़िवादी बंधनों से लड़कर ग्रामीण महिलाओं का आगे बढ़ाया हुआ एक कदम भी मीलों के सफर के समान है। इसीलिए हम आपके सामने लाए हैं कुछ ऐसी ही कहानियां जिनमें जीत का पैमाना भले ही छोटा-बड़ा हो लेकिन उसे हासिल करने के लिए जो साहस चाहिए उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती -

अपने पति को भी खेती सिखाती हैं महाराष्ट्र की संगीता

महाराष्ट्र के थाणे जिले के मण्डे गांव की रहने वाली संगीता म्हात्रे कुछ सालों पहले एक आम गृहिणी ही थीं जिसका पूरा दिन घरेलू काम-काज निपटाने, अपने पति की खेतों में मदद करने और अपने दो बच्चों को सम्भालने में ही निकल जाता था। लेकिन साल 2015 में संगीता को 'बेफ डिवेलपमेंट रिसर्च फाउंडेशन' के एक कार्यक्रम के बारे में पता चला जिसके लिए उन्हें कृषि सखी की तलाश थी। कुछ नया सीखने की उम्मीद के साथ संगीता ने इसमें

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March 2020