जानी जान का दुश्मन

Satyakatha|May 2020

जानी जान का दुश्मन
जब किसी पुरुष और औरत के बीच अवैध संबंध बनते हैं तो दोनों बिना सोचेसमझे उसे प्यार का नाम दे देते हैं. साथ ही एकदूसरे से वादा भी करते हैं कि इस प्यार को जिंदगी भर निभाएंगे. जबकि हकीकत यह होती है कि दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं कि वे दलदल में खड़े हैं. उमा और राजवीर की सोच भी कुछ...
नितिन कुमार शर्मा

राजवीर देखने में भले ही साधारण व्यक्ति था, लेकिन वह बातों का धनी था. अपनी लच्छेदार बातों से वह किसी का भी मन मोह लेता था. राजवीर मेवाराम की पत्नी उमा के खूबसूरत हुस्न का दीवाना था. उमा भी उस की जवांदिली पर लटू थी.

शाम का समय था. राजवीर घर आया तो उमा उस के लिए चाय बना लाई. चाय के साथ गरमागरम पकौड़े भी थे. पकौड़े राजवीर को बहुत पसंद हैं, यह बात उमा जानती थी. राजवीर चहक उठा, “भई वाह, ये हुई न बात.

फिर एक पकौड़ा मुंह में रख कर स्वाद लेते हुए पूछ बैठा, तुम मेरे दिल की बात कैसे जान गईं?

उमा मुसकराते हुए बोली, “जब हमारे दिल के साथसाथ शरीर भी एक हो चुके हैं तो दिल की बात एकदूसरे से कैसे छिपी रह सकती है.

वाकई तुम्हारी यह बात बिलकुल सही है. देखो, तुम्हारी चाय का रंग भी तुम्हारे रंग जैसा है. लगता है जैसे चाय में तुम ने अपने हुस्न का रंग मिला दिया हो. चाय का स्वाद भी तुम्हारे जैसा मीठा है. पकौड़े भी तुम्हारे जिस्म के अंगों की तरह गर्म और स्वादिष्ट है.

अपने हुस्न की तारीफ का यह अंदाज उमा को अच्छा लगा. वह राजवीर से सट कर उस की आंखों में आंखें डाल कर बोली, जो कुछ मेरे पास है, उस पर तुम्हारा ही तो अधिकार है.

राजवीर ने उस की दुखती रग को छेड़ते हुए कहा, तुम्हारे खूबसूरत जिस्म पर तो तुम्हारे पति मेवाराम का सर्वाधिकार है. लोग भी उस के ही अधिकार को स्वीकृति देंगे.

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May 2020